कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

आलू उत्पादन की तकनीकी

रबी गेंहू कठिया (डयूरम) गेहूँ की खेती जौ जई तोरिया (लाही) राई और सरसों पीली सरसों अलसी कुसुम रबी मक्का शिशु मक्का (बेबी कॉर्न) की खेती चना मटर मसूर रबी राजमा बरसीन रबी शाकभाजी एवं मसाला फसलों के प्रभावी बिन्दु बोरो धान की खेती आलू उत्पादन की तकनीकी प्रदेश में आलू उत्पादन हेतु प्रमुख प्रजातियाँ मशरूम की खेती सहफसली खेती कांस उंप मोथा का रसायनों द्वारा नियंत्रण संतुलित उर्वरक प्रयोग में नीम लेपित यूरिया का उपयोग एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन कृषि उत्पादों में जैव उर्वरकों की महत्ता एवं उपयोग नादेव (नैडप) कम्पोस्ट जैविक कृषि में केंचुआ खाद जैविक कृषि में केंचुआ खाद रबी हेतु उपयोगी कृषि यंत्र बौछारी (स्प्रिंकलर) सिंचाई विधि रबी के मौसम में ऊसर सुधार कार्यक्रम जैविक एजेंट एवं जैविक कीटनाशकों के प्रयोग द्वारा कृषि रक्षा प्रबन्धन एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) विभागीय कृषि रक्षा इकाइयों पर उपलब्ध फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य प्रतिबन्धित रसायनों की सूची प्रतिबंधित कीटनाशकों की सूची प्रमुख रसायनिक फसलों के आंकड़े उर्वरको की पहचान किसान काल सेन्टर मौन पालन एक लाभदायक व्यवसाय बीज उत्पादक कम्पनियों के नाम महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

आलू की उत्पत्ति दक्षिण अमेरिका को माना जाता है, लेकिन भारतवर्ष में आलू प्रथम बार सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप से आया। चावल, गेहूँ, गन्ना के बाद क्षेत्रफल में आलू का चौथा स्थान है। आलू एक ऐसी फसल है जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल में अन्य फसलों (गेहूँ, धान एवं मूँगफली) की अपेक्षा अधिक उत्पादन मिलता है तथा प्रति हेक्टर आय भी अधिक मिलती है। आलू में मुख्य रूप से 80-82 प्रतिशत पानी होता है और 14 प्रतिशत स्टार्च, 2 प्रतिशत चीनी, 2 प्रतिशत प्रोटीन तथा 1 प्रतिशत खनिज लवण होते हैं। वसा 0.1 प्रतिशत तथा थोड़ी मात्रा में विटामिन्स भी होते हैं।

आलू की उन्नत खेती

जलवायु

आलू समशीतोष्ण जलवायु की फसल है। उत्तर प्रदेश में इसकी खेती उपोष्णीय जलवायु की दशाओं में रबी के मौसम में की जाती है। सामान्य रूप से अच्छी खेती के लिए फसल अवधि के दौरान दिन का तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस तथा रात्रि का तापमान 4-15 डिग्री सैल्सियस होना चाहिए। फसल में कन्द बनते समय लगभग 18-20 डिग्री सेल्सियस तापकम सर्वोत्तम होता है। कन्द बनने के पहले कुछ अधिक तापक्रम रहने पर फसल की वानस्पतिक वृद्धि अच्छी होती है, लेकिन कन्द बनने के समय अधिक तापक्रम होने पर कन्द बनना रूक जाता है। लगभग 30 डिग्री सैल्सियस से अधिक तापक्रम होने पर आलू की फसल में कन्द बनना बिलकुल बन्द हो जाता है।

भूमि एवं भूमि प्रबन्ध

आलू की फसल विभिन्न प्रकार की भूमि, जिसका पी.एच. मान 6 से 8 के मध्य हो, उगाई जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट तथा दोमट उचित जल निकास की भूमि उपयुक्त होती है। 3-4 जुताई डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाने से ढेले टूट जाते हैं तथा नमी सुरक्षित रहती है। वर्तमान में रोटावेटर से भी खेत की तैयारी शीघ्र व अच्छी हो जाती है। आलू की अच्छी फसल के लिए बोने से पहले पलेवा करना चाहिए।

कार्बनिक खाद

यदि हरी खाद का प्रयोग न किया हो तो 15-30 टन प्रति है0 सड़ी गोबर की खाद प्रयोग करने से जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है, जो कन्दों की पैदावार बढाने में सहायक होती है।

खाद तथा उर्वरक प्रबन्ध

सामान्य तौर पर 180 किग्रा० नत्रजन, 80 किग्रा० फास्फोरस तथा 100 किग्रा० पोटाश की संस्तुति की जाती है। मृदा विश्लेषण के आधार पर यह मात्रा घट-बढ़ सकती है। 180: 80: 100 किग्रा० नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश/है. की पूर्ति हेतु उर्वरकों के विभिन्न विकल्प निम्न हो सकते हैं -

खाद तथा उर्वरक प्रबन्ध
उर्वरकों की अनुमोदित मात्रा विकल्प-1 (सी.ए.एन. के साथ) विकल्प-2 (यूरिया के साथ) विकल्प-3 (डी.ए.पी.के साथ) विकल्प-4
  उर्वरक का नाम मात्रा (किग्रा०) उर्वरक का नाम मात्रा (किग्रा०) उर्वरक का नाम मात्रा (किग्रा०) उर्वरक का नाम मात्रा (किग्रा०)
1 नाइट्रोजन
अ- बुआई के समय
ब- मट्टी चढ़ाते समय
कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट यूरिया 360 यूरिया 130 यूरिया डी.ए.पी. 128 174 यूरिया एन०पी०के० 130 250
यूरिया 261 यूरिया 196 यूरिया 196
2 फास्फोरस बुआई के समय सिंगल सुपर फास्फेट 500 सिंगल सुपर फास्फेट 500 - - - -
3 पोटाश बुआई के समय म्यूरेट ऑफ पोटाश 167 म्यूरेट ऑफ पोटाश 167 म्यूरेट ऑफ पोटाश 167 म्यूरेट ऑफ पोटाश 167

मिट्टी परीक्षण की संस्तुति के अनुसार अथवा 25 किग्रा० जिंक सल्फेट एवं 50 किग्रा० फेरस सल्फेट प्रति है. की दर से बुआई से पहले कम वाले क्षेत्रों में प्रयोग करना चाहिए तथा आवश्यक जिंक सल्फेट का छिड़काव भी किया जा सकता है।

बीज

उद्यान विभाग, उत्तर प्रदेश आलू का आधारीय प्रथम श्रेणी का बीज कृषकों में वितरण करता है। इस बीज को 3-4 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है।

बोने के लिए 30-55 मिमी. व्यास का अंकुरित (चिटिंग) आलू बीज का प्रयोग करना चाहिए। एक हेक्टेयर के लिए 30-35 कुन्तल बीज की आवश्यकता पड़ती है। प्रजातियों का चयन क्षेत्रीय आवश्यकताओं एवं बुआई के समय यथा अगेती फसल, मुख्य फसल अथवा पिछेती फसलों के अनुसार किया जाना उचित होता है। प्रदेश की भू से जलवायु स्थितियों के अनुसार संस्तुति प्रजातियों का विवरण निम्नवत् है -