कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

मसूर

रबी गेंहू कठिया (डयूरम) गेहूँ की खेती जौ जई तोरिया (लाही) राई और सरसों पीली सरसों अलसी कुसुम रबी मक्का शिशु मक्का (बेबी कॉर्न) की खेती चना मटर मसूर रबी राजमा बरसीन रबी शाकभाजी एवं मसाला फसलों के प्रभावी बिन्दु बोरो धान की खेती आलू उत्पादन की तकनीकी प्रदेश में आलू उत्पादन हेतु प्रमुख प्रजातियाँ मशरूम की खेती सहफसली खेती कांस उंप मोथा का रसायनों द्वारा नियंत्रण संतुलित उर्वरक प्रयोग में नीम लेपित यूरिया का उपयोग एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन कृषि उत्पादों में जैव उर्वरकों की महत्ता एवं उपयोग नादेव (नैडप) कम्पोस्ट जैविक कृषि में केंचुआ खाद जैविक कृषि में केंचुआ खाद रबी हेतु उपयोगी कृषि यंत्र बौछारी (स्प्रिंकलर) सिंचाई विधि रबी के मौसम में ऊसर सुधार कार्यक्रम जैविक एजेंट एवं जैविक कीटनाशकों के प्रयोग द्वारा कृषि रक्षा प्रबन्धन एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) विभागीय कृषि रक्षा इकाइयों पर उपलब्ध फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य प्रतिबन्धित रसायनों की सूची प्रतिबंधित कीटनाशकों की सूची प्रमुख रसायनिक फसलों के आंकड़े उर्वरको की पहचान किसान काल सेन्टर मौन पालन एक लाभदायक व्यवसाय बीज उत्पादक कम्पनियों के नाम महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

भूमि

दोमट से भारी भूमि इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त है। धान के बाद खाली खेती में मसूर विशेषकर बोयी जाती है।

भूमि की तैयारी

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयां देशी हल से करके पाटा लगाना चाहिये।

संस्तुत प्रजातियॉ

क्रं.सं. प्रजातियाँ उत्पादकता (कु0/हे0) पकने की अवधि (दिन) उपयुक्त क्षेत्र विशेषतायें
1 आई.पी.एल.-81 18-20 120-125 बुन्देलखण्ड छोटा दाना, रतुवा रोग सहिष्णु
2 नरेन्द्र मसूर-1 20-22 135-140 सम्पूर्णउ० प्र० रतुआ अवरोधी, मध्यम दाना
3 डी.पी.एल.-62 18-20 130-135 सम्पूर्णउ० प्र० दाना मध्यम बड़ा
4 पन्त मसूर-5 18-20 130-135 सम्पूर्णउ० प्र० मध्यम दाना रतुवा अवरोधी
5 पन्त मसूर-4 18-20 135-140 मैदानी क्षेत्र दाने छोटे रतुवा अवरोधी
6 डी.पी.एल.-15 18-20 130-135 मैदानी क्षेत्र दाना मध्यम, बड़ा रतुआ सहिष्णु।
7 एल-4076 18-20 135-140 सम्पूर्णउ० प्र० पौधे गहरे हरे रंग के‚ कम फैलने वाले
8 पूसा वैभव 18-22 135-140 मैदानी क्षेत्र तदैव
9 के.-75 14-16 120-125 सम्पूर्णउ० प्र० पौधे मध्यम‚ दाने बड़े‚ रतुआ ग्रसित
10 एच.यूएल.-57 (मालवीय विश्वनाथ) 18-22 125-135 सम्पूर्णउ० प्र० छोटा दाना तथा रतुआ अवरोधी
11 के.एल.एस.-218 18-20 125-130 पूर्वीउ० प्र० छोटा दाना तथा रतुआ अवरोधी
12 आई.पी.एल.-406 15-18 125-130 पश्चिमीउ० प्र० बड़ा दाना तथा रतुआ अवरोधी
13 शेखर-3 20-22 125-130 सम्पूर्णउ० प्र० रतुआ अवरोधी एवं उकठा अवरोधी
14 शेखर-2 20-22 125-130 सम्पूर्णउ० प्र० रतुआ अवरोधी एवं उकठा अवरोधी
15 आई.पी.एल.-316 18-22 115-120 बुन्देलखण्ड उकठा अवरोधी

बुवाई का समय

समय से बुवाई अक्टूबर के मध्य से नवम्बर के मध्य तक तथा विलम्ब की दशा में दिसम्बर से प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई करना उपयुक्त है। पन्तनगर जीरो टिल सीड ड्रिल द्वारा मसूर की बुवाई अधिक लाभप्रद है।

बीज दर

समय से बुवाई हेतु 30-40 किलोग्राम तथा पिछेती एवं उत्तेरा बुवाई के लिए 40-50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त हैं।

बीजोपचार

10 किग्रा० बीज को मसूर के एक पैकेट 200 ग्राम राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए। विशेषकर उन खेतों में जिनमें पहले मसूर न बोई गयी हो। बीजोपचार एवं रासायनिक उपचार के बाद बीजोपचार किया जाय। पी0 एस0 बी0 का अवश्य प्रयोग करें।

उर्वरक

समान्य बुवाई में 20 किग्रा० नत्रजन, 60 किग्रा० फास्फोरस, 20 किग्रा० पोटाश तथा 20 किग्रा० गंधक/हे० प्रयोग करें। उतेरा विधि से बुवाई के लिए 20 किग्रा० नत्रजन धान की कटाई के बाद टापड्रेसिंग करे तथा फास्फोरस 30 किग्रा० को दो बार फूल आने तथा फलिया बनते समय पर्णीय छिड़काव करें।

सिंचाई

एक सिंचाई फूल आने के पूर्व करनी चाहिए। धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में यदि वर्षा न हो तो एक सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए।

फसल सुरक्षा

(क) प्रमुख कीट

  • माहूँ कीट
    इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों, तनों एवं फलियों का रस चूस कर कमजोर कर देते है। माहूँ मधुस्राव करते है जिस पर काली फफूँद उग आती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है।
  • अर्द्धकुण्डलीकार कीट (सेमीलूपर)
    इस कीट की सूडियाँ हरे रंग की होती है जो लूप बनाकर चलती है। सूडियाँ पत्तियों, कोमल टहनियों, कलियों, फूलों एवं फलियों को खाकर क्षति पहुँचाती है।
  • फली बेधक कीट
    इस कीट की सूड़ियॉ फलियों में छेद बनाकर अन्दर घुस जाती है तथा अन्दर ही अन्दर दानों को खाती रहती है। तीव्र प्रकोप की दशा में फलियाँ खोखली हो जाती है तथा उत्पादन में गिरावट आ जाती है।
आर्थिक क्षति स्तर
क्र.सं. कीट का नाम फसल की अवस्था आर्थिक क्षति स्तर
1 माहूँ वानस्पतिक अवस्था एवं फूल 5 प्रतिशत प्रभावित पौधे
2 अर्द्धकुण्डलीकार कीट फूल एवं फलियाँ बनते समय 2 सूँड़ी प्रति 10 पौधे
3 फली बेधक कीट फलियाँ बनते समय 5 प्रतिशत प्रभावित पौधे