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उत्तर प्रदेश

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कृषि उत्पादों में जैव उर्वरकों की महत्ता एवं उपयोग

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पिछले दशकों में आत्मनिर्भरता की स्थिति तक कृषि की वृद्धि में उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरको, सिंचाई जल एवं पौध संरक्षण का उल्लेखनीय योगदान है। वर्तमान उर्जा संकट ओर निरंतर क्षीणता की ओर अग्रसर उर्जा स्रोतों के कारण रासायनिक उर्वरकों की कीमतें आसमान को छूने लगी हैं। फसलों द्वारा भूमि से लिए जाने वाले प्राथमिक मुख्य पोषक तत्वों-नत्रजन, फास्फेट एवं पोटाश में से नत्रजन का सर्वाधिक अवशोषण होता है क्योंकि इस तत्व की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं भूमि में डाले गये नत्रजन का 40-50 प्रतिशत ही फसल उपयोग कर पाते है और शेष 50-60 प्रतिशत भाग या तो पानी के साथ बह जाता है या वायु मण्डल में डिनाइट्रीफिकेशन से मिल जाता है या जमीन में ही अस्थायी बन्धक हो जाते है। अन्य पोषक तत्वों की तुलना में भूमि में उपलब्ध नत्रजन की मात्रा सबसे न्यून स्तर की होती है। यदि प्रति किलो पोषक तत्व की कीमत की ओर ध्यान दें तो नत्रजन ही सबसे अधिक कीमती है। अतः नत्रजनधारी उर्वरक के एक-एक दाने का उपयोग मितव्ययता एवं सावधानी से करना आज की अनिवार्य आवश्यकता हो गई है।

भारत जैसे विकासशील देश में नत्रजन की इस बड़ी मात्रा की आपूर्ति केवल रासायनिक उर्वरकों से कर पाना छोटे और मध्यम श्रेणी के किसनों की क्षमता से परे है। अतः फसलों की नत्रजन आवश्यकता की पूर्ति के लिए पूर्णरूप से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना तर्क संगत नहीं है। वर्तमान परिस्थितियों में नत्रजनधारी उर्वरकों के साथ-साथ नत्रजन के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि मृदा की उर्वराशक्ति को टिकाऊ, अक्षुण रखने के लिए भी आवश्यक है। ऐसी स्थिति में जैव उर्वरकों एवं सान्द्रिय पदार्थों के एकीकृत उपयोग की नत्रजन उर्वरक के रूप में करने की अनुशंसा की गई है। भूमि में सूक्ष्म जीवों की सम्मिलित सक्रियता के लिये निम्न दशायें अनुकूल होती है:-

  • जीवांश पदार्थो की उपस्थिति
  • नमी
  • वायु सचार
  • निरन्तर उदासीन के आसपास पी0एच0 मान यह चारों आवश्यकतायें एक मात्र कम्पोस्ट से पूरी की जा सकती है।

जैव उर्वरक या जीवाणु खाद क्या है ?

सभी प्रकार के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए मुख्यतः 17 तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनमें नाइट्रोजन एवं फास्फोरस अति आवश्यक तत्व हैं। यह पौधों को तीन प्रकार से उपलब्ध होती है।

  • रासायनिक खाद द्वारा
  • ख. गोबर की खाद द्वारा
  • ग. नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणुओं द्वारा प्राकृतिक रूप से मिट्टी में कुछ ऐसे जीवाणु पाये जाते हैं, जो वायु मण्डलीय नत्रजन को अमोनिया में एवं अनुपलब्ध फास्फोरस को उपलब्ध अवस्था में बदल देते हैं। जीवाणु खाद ऐसे ही जीवाणुओं का उत्पाद है, जो पौधों को नत्रजन एवं फास्फोरस आदि की उपलब्धता बढ़ाता है।

जैव उर्वरक निम्न प्रकार के उपलब्ध हैं

1. राइजोबियम 4. फास्फोटिका
2. एजोटोबेक्टर 5. नील हरित शैवाल
3. एजोस्पाइरिलम    

राइजोबियम

यह एक नमी धारक पदार्थ एवं जीवाणु का मिश्रण है, जिसके प्रत्येक एक ग्राम भाग में 10 करोड़ से अधिक राइजोबियम जीवाणु होते हैं। यह जैव उर्वरक केवल दलहनी फसलों में ही प्रयोग किया जा सकता है तथा यह फसल विशिष्ट होती है, अर्थात अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग प्रकार राइजोबियम जैव उर्वरक का प्रयोग होता है। राइजोबियम जैव उर्वरक से बीज उपचार कर लें पर ये जीवाणु खाद से बीज पर चिपक जाते हैं। बीज अंकुरण पर ये जीवाणु जड़ मूल रोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ों पर गन्थियों का निर्माण करते हैं। ये ग्रन्थियां नत्रजन स्थिरीकरण इकाईयां तथा पौधों की बढ़वार इनकी संख्या पर निर्भर करती है। अधिक ग्रन्थियों के होने पर पैदावार भी अधिक होती है।

किन फसलों में प्रयोग किया जा सकता है ?

अलग-अलग फसलों के लिए राइजोबियम जैव उर्वरक के अलग-अलग पैकेट उपलब्ध होते है तथा निम्न फसलों में प्रयोग किये जाते है।

  • मूंग, उर्द, अरहर, चना, मटर, मसूर, आदि।
  • तिलहनी, मूँगफली, सोयाबीन।
  • अन्य: रिजका, बरसीम, एवं सभी प्रकार की वीन्स।

कैसे प्रयोग करें ?

200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से 10 कि0ग्रा0 बीज उपचारित कर सकते है। एक पैकेट को खोले तथा 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर 50 ग्राम गुड़ एवं 500 मि0ली0 पानी में डालकर अच्छी प्रकार घोल बना लें। बीजों को किसी साफ सतह पर इकट्ठा कर जैव उर्वरक के घोल को बीजों पर धीरे-धीरे डालें और हाथ से तब तक उलटते पलटते जायें जब तक कि सभी बीजों पर जैव उर्वरक की समान परत न बन जाये। अब उपचारित बीजों को किसी छायादार स्थान पर फैलाकर 10-15 मिनट तक सुखा लें और तुरन्त बो दें।

राइजोबियम कल्चर के प्रयोग से लाभ

  • इसके प्रयोग से 10 से 30 किलो रासायनिक नत्रजन की बचत होती है।
  • इसके प्रयोग से फसल की उपज 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है।
  • राइजोबियम जीवाणु कुछ हारमोन एवं विटामिन भी बनाते हैं, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और जड़ों का विकास भी अच्छा होता है।
  • इन फसलों के बाद बोई जाने वाली फसलों में भी भूमि की उर्वराशक्ति अधिक होने से पैदावार अधिक मिलती है।

एजोटोबैक्टर/एजोस्पाइरिलम/जैव उर्वरक

यह जैव उर्वरक स्वतंत्रजीवी नत्रजन स्थिरीकरण, एजोटोबेक्टर या एजोस्पाइरिलम जीवाणु का एक नम चूर्णरूप उत्पाद है। इसके एक ग्राम में लगभग 10 करोड़ जीवाणु होते है। यह जैव उर्वरक किसी भी फसल (दलहनी जाति की फसलों को छोड़कर) में प्रयोग किया जा सकता है।

एजोटोबेक्टर/एजोस्पाइरिलम जैव उर्वरक से लाभ

  • फसलों की 10 से 20 प्रतिशत तक पैदावार में बढ़ोत्तरी होती है तथा फलों एवं दानों का प्राकृतिक स्वाद बना रहता है।
  • इसके प्रयोग करने से 20 से 30 किग्रा० नत्रजन की बचत भी की जा सकती है।
  • इनके प्रयोग करने से अंकुरण शीघ्र और स्वस्थ होते हैं तथा जड़ों का विकास अधिक एवं शीघ्र होता है।
  • फसलें भूमि से फास्फोरस का अधिक प्रयोग कर पाती हैं जिससे किल्ले अधिक बनते है।
  • इन जैव उर्वरकों के जीवाणु बीमारी फैलाने वाले रोगाणुओं का दमन करते हैं, जिससे फसलों का बीमारियों से बचाव होता है तथा पौधों में रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है।
  • ऐसे जैव उर्वरकों का प्रयोग करने से जड़ों एवं तनों का अधिक विकास होता है, जिससे पौधों में तेज हवा, अधिक वर्षा एवं सूखे की स्थिति को सहने की क्षमता बढ़ जाती है।

फास्फोटिका जैव उर्वरक

फास्फोटिका जैव उर्वरक भी स्वतंत्र-जीवों जीवाणु का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है। इससे भी एक ग्राम में लगभग 10 करोड़ जीवाणु होते है। यह जैव उर्वरक प्रयोग करने से मृदा में उपस्थित अधुलनशील फास्फोरस घुलनशील अवस्था में जीवाणुओं द्वारा बदल जाती है।

साधारतयाः मृदा में भी उपरोक्त प्रकार के जीवाणु होत है। परन्तु यह आवश्यक नही है। मृदा में उपस्थित जीवाणु सक्षम एवं क्रियाशील हो। अतः कल्चर के माध्यम से किसानों को असरकारक जीवित पदार्थो या जीवाणु उपलब्ध कराये जाते है।

फास्फेटिका जैव उर्वरक के लाभ

  • फास्फोटिका जीवाणु खाद के प्रयोग करने से 10 से 20 प्रतिशत पैदावार में बढोत्तरी के साथ-साथ मिट्टी में उपलब्ध फास्फोरस की 30 से 50 प्रतिशत की बचत की जा सकती है।
  • जड़ों का विकास अधिक होता है, जिससे पौधा स्वस्थ बना रहता है।

सावधानियां

  • राइजोबियम जीवाणु फसल विशिष्ट होता है। अतः पैकेट पर लिखी फसल में ही प्रयोग करें।
  • जैव उर्वरक को धूप व गर्मी से दूर किसी सूखी एवं ठंडी जगह से रखें।
  • जैव उर्वरक या जैव उर्वरक उपचारित बीजों को किसी भी रसायन या रासायनिक खाद के साथ न मिलायें।
  • यदि बीजों पर फफूंदी नाशी का प्रयोग करना हो तो बेक्स्टिीन का प्रयोग करें, यदि ताँबा एवं पारायुक्त रसायन का प्रयोग करना हो तो बीजों को पहले फफूंदी नाशी से उपचारित करें तथा फिर जैव उर्वरक की दुगुनी मात्रा से उपचारित करें।
  • जैव उर्वरक का प्रयोग पैकेट पर लिखी अन्तिम तिथि से पहले ही कर लेना चाहिए।
  • जैव उर्वरक किसी प्रमाणित संस्था से ही क्रय करें अन्यथा उसके जीवाणु क्रियाशील नहीं होते हैं।

एजोटोबेक्टर/एजोस्पाइरिलम/फास्फेटिक जैव उर्वरक की मात्रा एवं प्रयोग विधियॉ

एजोटोबेक्टर/एजोस्पाइरिलम/फास्फेटिक, जैव उर्वरक की मात्रा एवं प्रयोग विधियाँ:
क्र०सं० प्रयोग विधि फसल जैव उर्वरक मात्रा/एकड़
1 बीजोपचारः आवश्यकतानुसार जैव उर्वरक की मात्रा को लगभग 1.5 लीटर पानी प्रति एकड़ बीज के ढेर पर धीरे-धीरे डालकर हाथों से तक मिलायें जब तक कि जैव उर्वरक की बीजों पर समान रूप से परत न चढ़ जाये। उपचारित बीज को छाया में रखें अथवा तुरन्त बीजाई कर दें। गेहूं‚ ज्वार मक्का‚ कपास सूरजमुखी‚ सरसों 2 किग्रा० 500 ग्राम 200 ग्राम
2 पौध जड़ उपचारः आवश्यकतानुसार जैव उर्वरक की मात्रा की 4 लीटर पानी प्रति 1 किलोग्राम के हिसाब से किसी चौड़े मुंह वाले बर्तन में घोल बनायें‚ इस घोल को पौधे की जड़ों को 2 से 3 मिनट तक डुबोकर पौध उपचार करे तथा फिर‚ उपचारित पौधे की तुरन्त खेत में रोपाई कर दें। धान मिर्च‚ टमाटर‚ गोभी‚ बैगन‚ प्याज‚ आदि 1.5 किग्रा० 2 किलोग्राम
3 कन्द उपचारः आवश्यकतानुसार जैव उर्वरक की मात्रा को 15 ली० पानी प्रति 2 किग्रा० जैव उर्वरक के हिसाब से घोल बनाकर कन्द को 5 से 10 मिनट तक डुबाये रखें या जैव उर्वरक के घोल में कन्द पर समान रूप से छिड़काव करे तथा उपचारित कन्दों की तुरन्त बीजाई कर दें। फसलों के लिए (अर्थात 6 माह से कम समय में पकने वाली) 2.5 किग्रा०
4 मृदा उपचारः आवश्यकतानुसार जैव उर्वरक को 35 से 50 किग्रा० कम्पोस्ट खाद या भुरभुरी मिट्टी में मिश्रण बनाकर अन्‍तिम जुताई के समय अथवा फसल की पहली सिंचाई से पूर्व समान रूप से एक एकड़ खेत में छिड़क कर मिट्टी में मिला दें। लम्बी अवधि वाली फसलों के लिए (अर्थात 6 माह से अधिक समय से पकने वाली) 3.5 किग्रा०
5 नील हरित शैवाल धान में नील हरित शैवाल जैव उर्वरक 12.5 किग्रा० प्रति हेक्टर रोपाई के एक सप्ताह बाद प्रयोग करें। इसका प्रयोग करते समय खेत में 3-4 सेमी० पानी अवश्य भरा रहना चाहिए यदि धान में किसी खरपतवार नाशी का प्रयोग किया है तो नील हरित शैवाल का प्रयोग खरपतवार नाशी के प्रयोग के 3-4 दिन बाद प्रयोग करें।