कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

बरसीन

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बरसीन

बरसीन हरे चारें अपने गुणों द्वारा दुधारू पशुओं के लिये प्रसिद्ध है। उत्तरी/पूर्वी क्षेत्र में मक्का या धान के बाद इसकी सफल खेती होती है।

भूमि

दोमट तथा दोमट अधिक उपयुक्त है। बरसीन के लिए अम्लीय मृदा अनुपयुक्त है।

भूमि की तैयारी

खरीफ की फसल के बाद पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से फिर 2-3 बार हैरों चलाकर मिट्टी भूरभूरी कर लेना चाहिये। बुवाई के लिए खेत के लगभग 4*5 मी. की क्यारियों में बॉट ले।

उन्नतिशील प्रजातियॉ

क्र.सं. प्रजातियॉ हरा चारा (कु०हे०) उपयुक्त क्षेत्र
1. वरदान 900-1000 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
2. मेस्कावी 800-900 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
3. बुंदेलखण्ड बरसीन-2
(जे.एच.बी.-146)
900-1100 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
4. बुंदेलखण्ड बरसीन-3
(जे.एच.टी.बी.-146)
950-1100 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश पश्चिमी व पूर्वी क्षेत्र

बुवाई का समय

बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक करना ठीक रहता है। देर से बोने पर कटाई की संख्या कम और चारों की उपज प्रभावित होता हे।

बुवाई की विधि

तैयार क्यारियों में 5 सेमी० गहरा पानी भरकर उसके ऊपर बीज छिड़क देते है। बुवाई के 24 घण्टें बाद क्यारी से जल निकाल कर देना चाहिये। जहॉ धान काटने मे देर हो वहॉ बरसीन की उतेरा करना उचित है इसमें धान कटने से 10-15 दिन पूर्व ही बरसीन को खड़ी फसल में छिड़काव विधि से बुवाई करते है।

बीज दर

प्रति हेक्टेयर 25-30 किग्रा० बीज बोते है। पहली कटाई मे चारा की उपज अधिक लेने के लिए 1 किग्रा० /हे० चारे वाली टा -9 सरसों का बीज बरसीन में मिलाकर बोना चाहियें।

कटाई

कटाई 8-10 सेमी० की जमीन के ऊपर करने से कल्ले निकलते है। बीज लेने के लिए पहली कटाई के बाद फसल छोड दे।

बीजोपचार

प्रायः बरसीन के साथ कासनी का बीज मिला रहता है। मििŸात बीज को 5-10 प्रतिशत नमक के घोल में डाल देने से कासनी का बीज ऊपर तैरने लगता है। इसे छानकर अलग कर लेते है। बरसीन के बीज का ेनमक के घोल से तुरन्त निकाल कर साफ पानी से अच्छी तरह धोले।
यदि बरसीन की किसी खेत में पहली बार बुवाई की जा रही है। तो उसे प्रति 10 किग्रा० बीज को 250 ग्राम बरसीन कल्चर की दर से उपचारित कर लें। कल्चर ने मिलने पर बरसीन के बीज के बराबर मात्रा में पहले बरसीन बोई गंई खेत की नम भुरभुरी मिट्टी मिला लेते है।

उर्वरक

20 किग्रा० नत्रजन एंव 80 किग्रा० फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से बोते समय खेत में छिड़कर कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें।

सिचाई

पहली : सिंचाई बीज अंकुरण के तुरन्त बाद करनी चाहियें। बाद में प्रत्येक सप्ताह के अन्तर पर 2-3 बार सिंचाई करनी चाहियें। इसके पश्चात फरवरी ंके अन्त तक बीस दिन के अन्तर पर सिंचाई करें मार्च से मई तक 10 दिन कि अन्तर पर सिंचाई करना आवश्यक होगा। साधारणतः प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य की जानी चाहियें। एक बार में लगभग 5 सेन्टीमीटर से ज्यादा पानी नही देना चाहिये।

कटाई

कुल 4-5 कटाई करते है। कटाई 5-6 सेंमी. ऊपर से करना चाहिये।

पहली कटाई बोने के 45 दिन
दिसम्बर एवं जनवरी 30-35 दिन बाद
फरवरी से 20-25 दिन के अन्तर पर

बीजोत्पादन

बरसीन की 2-3 कटाई के बाद कटाई बन्द कर दें। फरवरी का अन्तिम या मार्च का प्रथम सप्ताह उपयुक्त है। अन्तिम कटाई के 10-15 दिन तक सिंचाई रोक देना चाहियें। अधिक बार कटाई करने से बीज का उपज कम एवं कमजोर होते है।

उपज

प्रति हेक्टेयर 80-100 टन हरा प्राप्त होता है। 2-3 कटाई के बाद बीज 2-3 कुन्तल/हे० एवं 40-50 टन/हे० हरा चारा मिल जाता है।