कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन

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खेत की तैयारी
सामान्य धान की फसल हेतु तैयार किये जाने वाले खेत की भॉति ही स्री पद्धति के लिये भी खेत तैयार किया जाता है। फसल अवधि में विशेष रूप से प्रारम्भिक अवस्था में जल निकासी हेतु उचित प्रबन्ध किया जाना आवश्यक है।

मार्कर का प्रयोग
रस्सी में निर्धारित दूरी पर गॉठें या लकड़ी लगाकर रोपाई रस्सी के सहारे निर्धारित दूरी पर की जा सकती है। इसके अतिरिक्त दूरी निर्धारित करने के लिये लकड़ी या लोहे के बने वर्गाकार मार्कर का निशान लगाने के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। रोपाई कार्य जल्दी सम्पन्न करने के दिृष्टिगत मार्कर के माध्यम से निशान खेत में रोपाई के एक दिन पूर्व लगा सकते है।

रोपाई
स्री पद्धति के अन्तर्गत मात्र 8-12 दिन पुरानी पौध प्रयोग की जाती है। अतः पौध को खुरपी की सहायता से इस प्रकार निकालें कि पौध में बीज चोक एवं जड़ो में मिट्टी लगी रहे। यदि मैट विधि से नर्सरी डाली गई है मैट को सीधे उठाकर रोपाई वाले खेत के पास ले जा सकते हैं। 8-12 दिन अवधि की 2-3 पर्णीय पौध को 25 सेमी. से 25 सेमी. की दूरी पर 2-3 सेमी. पर अंगूठे एवं अनामिका अंगुली की सहायता से एक-एक पौध बीज चोल एवं मिट्टी सहित प्रति हिल बगैर पानी भरे खेत में लगायें। पौध की रोपाई जिस बिन्दु पर ऊर्द्धारकार एवं समानान्तर लाइन एक दूसरे को काटे पर करें। पौधे की जड़ों को सूखने से बचाने के लिए पौधशाला से पौध निकालने के बाद आधा घण्टे के अन्दर लगाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

खरपतवार नियन्त्रण
खरपतवार नियन्त्रण हेतु यांत्रिक विधि काफी सस्ती एवं उपयुक्त पाई गई है। वीडर के चलाने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि पौधों से पौधों की तथा लाईन से लाईन की दूरी अधिक हो जिससे दोनों ही ओर से वीडर को आसानी से चालाया जा सके। वीडर के द्वारा खरपवतार नियन्त्रण करने से खरपतवार खेत में ही पलटकर मिट्टी में दबने से सड़कर जैविक खाद का काम करते है जिससे पौधों को पोषक तत्व प्राप्त होते है। वीडर के प्रयोग से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और मृदा में वायु संचार बढ़ जाता है। जड़ों के पूर्ण विकसित होने के फलस्वरूप पौधे की वानस्पतिक एवं पुनरूत्पादक वृद्धि अधिक होती है। रोपाई के 10 दिन बाद से 10 दिन के अन्तराल पर 3-4 बार वीडर चलाकर खरपतवारों का नियन्त्रण किया जाना आवश्यक है। वीडर के सुचारू संचालन हेतु खेत में नमी होना आवश्यक है। स्री पद्धति के तहत धन की रोपाई दूरी पर की जाती है तथा कालान्तर में अधिक कल्ले निकलने के कारण बीच का अन्तराल कम होने लगता है। खरपतवार नियन्त्रण हेतु विभिन्न प्रदेशों के अनुभवों के आधार पर कोनोवीडर का प्रयोग अधिक प्राभावी पाया गया। अतः वीडर में निम्न खूबियॉ होनी चाहिएः

  • वीडर के दॉतों के बीच की दूरी कम-ज्यादा करने का प्रावधान हो।
  • वीडर के दॉतों से चिपकी मिट्टी छुड़ाने की व्यवस्था हो।
  • वीडर हल्का एवं टिकाऊ हो।
  • वीडर की कीमत कम हो।

जल प्रबन्धन
उचित जल प्रबन्धन हेतु खेत समतल हो तथा खेत में क्यारियों के मध्य सिंचाई एवं जल निकासी के लिये आवश्यकतानुसार नालियों का निर्माण करें। स्री पद्धति के अन्तर्गत यदि पौध रोपाई के समय पर्याप्त नमी न हो तो रोपाई के बाद खेत में हल्की सिंचाई कर दें। फसल की प्रारम्भिक एवं वानसपतिक वृद्धि की अवस्था में खेत में पानी भरकर रखना आवश्यक नहीं है। मिट्टी में हल्की दरारें पड़ने पर खेत में हल्की सिंचाई की जाये। खेत में सिंचाई अन्तिम छोर की क्यारी से प्रारम्भ की जाये तथा प्रत्येक क्यारी का 3/4 भाग सिंचित होते ही क्यारी में पानी जाना बन्द कर दें। इस प्रकार शेष 1/4 भाग पीछे से आज रहे पानी से सिंचित भी हो जायेगा तथा पानी की बचत भी होगी। धान में पुष्प-गुच्छ प्रारम्भ होने की अवस्था से फसल की परिपक्वता तक लगभग 2-3 सेमी. पानी बनाये रखने की संस्तुति की जाती है परन्तु जब लगभग 70 प्रतिशत दाने कड़े हो जायें फिर खेत में पानी खड़े रखने की आवश्यकता नहीं है।

एस.आर.आई पद्धति के लाभ

  1. कम बीज (6 किग्रा./हे.) की आवश्यकता।
  2. उत्पादन में वृद्धि (10-30 प्रतिशत तक)।
  3. फसल अवधि में कमी (7-10 दिन)।
  4. स्वस्थ पौध विकास के कारण कीट तथा बीमारियों में कमी।
  5. कम सिंचाई जल की आवश्यकता (50 प्रतिशत तक)।
  6. यांत्रिक निकाई से सूक्ष्म जीवों की अधिक सक्रियता के कारण मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता में सुधार।
  7. उर्वरक उपयोग में कमी (30–40 प्रतिशत)।
  8. उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पादन ।
  9. एस.आर.आई. प्रजनक/अधारीय/प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु अधिक उपयुक्त।
  10. पर्यावरण हितैषी।
  11. कम लागत एवं अधिक लाभ।