कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

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जैविक खेती

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जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि
1). बीज उपचार विधि

जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम विधि है।1/2 लीटर पानी में लगभग 50 ग्राम गुड़ या गोंद उबालकर अच्छी तरह मिलाकर घोल बना लेते है इस घोल को 10 किग्रा० बीज पर छिड़क कर मिला देते हैं जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाये। तब जैव उर्वरक को छिड़क कर मिला दिया जाता है। इसके उपरान्त बीजों को छायादार जगह में सुखा लेते हैं। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिए।

2). पौध जड़ उपचार विधि
धान तथा सब्जी वाली फसलें जिनके पौधों की रोपाई की जाती है जैसे टमाटर, फूलगोभी, पातगोभी, प्याज इत्यादि फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए किसी चौड़े व छिछले बर्तन में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम जैव उर्वरक मिला लेते है। इसके उपरान्त नर्सरी से पौधों को उखाड़कर तथा जड़ों से मिट्टी साफ करने के पश्चात् 50-100 पौधों को बण्डल में बांधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो देते हैं। इसके बाद तुरन्त रोपार्इ कर देते है।

3). कन्द उपचार विधि
गन्ना, आलू, अदरक, घुइया जैसे फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को उपचारित किया जाता है। एक किलोग्राम जैव उर्वरक को 20-30 लीटर घोलकर मिला लेते हैं। इसके उपरान्त कन्दों को 10 मिनट तक घोल में डुबोकर रखने के पश्चात बुवाई कर देते है।

4). मृदा उपचार विधि
5-10 किलोग्राम जैव उर्वरक 70-100 किग्रा० मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण तैयार करके अन्तिम जुताई पर खेत मिला देते है।

जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियां

  • जैव उर्वरक को हमेशा धूप या गर्मता से बचा कर रखना चाहिए।
  • कल्चर पैकेट उपयोग के समय ही खोलना चाहिए।
  • कल्चर द्वारा उपचारित बीज, पौध,मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण छाया में ही रखना चाहिए।
  • कल्चर प्रयोग करते समय उस पर उत्पादन तिथि, उपयोग की अन्तिम तिथि फसल का नाम आदि अवश्य लिखा देख लेना चाहिए।
  • निश्चित फसल के लिए अनुमोदित कल्चर का उपयोग करना चाहिए।

जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ

  • रासायनिक उर्वरक एवं विदेश मुद्रा की बचत।
  • लगभग 25-30 किग्रा०/हे० नाइट्रोजन एवं 15-20 किग्रा० प्रति हेक्टर पर फास्फोरस उपलब्ध कराना तथा मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशाओं में सुधार लाना।
  • विभिन्न फसलों में 15-20 प्रतिशत उपज में वृद्धि करना।
  • इसके प्रयोग से अंकुरण शीघ्र होता है तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होती है।
  • इनके प्रयोग से उपज में वृद्धि के अतिरिक्त गन्ने में शर्करा की तिलहनी फसलों में तेल की तथा मक्का एवं आलू में स्टार्च की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती है।
  • किसानों को आर्थिक लाभ होता है।

4. हरी खाद एवं उसकी उपयोगिता
मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि हेतु पौधों के हरे वानस्पतिक को उसी खेत में उगाकर या दूसरे स्थान से लाकर खेत में मिला देने की क्रिया को हरी खाद देना कहते है।

हरी खाद प्रयोग करने की विधियां

  • उसी खेत में उगाई जाने वाली हरी खादः जिस खेत में खाद देनी होती हैं, उसी खेत में फसल उगाकर उसे मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर मिट्टी में मिलाकर किया जाता है। इस विधि से हरी खाद तैयार करने के लिए सनई, ढैंचा, ग्वार,मूंग, उर्द आदि फसलें उगाई जाती हैं।
  • खेत में दूर उगाई जाने वाली हरी खादः जब फसलें अन्य दूसरे खेतों में उगाई जाती हैं और वहां से काटकर जिस खेत में हरी खाद देना होता है, उसमें मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर दबा देते हैं। इस विधि में जंगलों या अन्य स्थान पर उगे पेड़ पौधों एवं झाड़ियों की पत्तियों टहनियों आदि को खेत में मिला दिया जाता हैं।
  • हरी खाद हेतु प्रयोग की जाने वाली फसलें सनई, ढैंचा,मूंग, उर्द, मोठ, ज्वार, लोबिया, जंगली, नील बरसीम एवं सैंजी आदि।

हरी खाद से लाभ

  • हरी खाद से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा से भौतिक दशा में सुधार होता है।
  • नाइट्रोजन की वृद्धि हरी खाद के लिए प्रयोग की गई दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रन्थियां होती है। जो नत्रजन का स्थिरीकरण करती हैं। फलस्वरूप नत्रजन की मात्रा में वृद्धि होती है। एक अनुमान लगाया गया है कि ढैंचा को हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से प्रति हेक्टेयर 60 किग्रा० नाइट्रोजन की बचत होती है तथा मृदा के भौतिक रासायनिक तथा जैविक गुणों में वृद्धि होती है, जो टिकाऊ खेती के लिए आवश्यक है।

5. एकीकृत कीट एवं व्याधि नियंत्रण
जैविक खेती का लक्ष्य कीड़ों का विनाश करना नहीं है किन्तु उनका आर्थिक स्तर पर नियंत्रण करना है। इसके लिए स्वस्थ कृषि, परजीवी कीड़ों, फिरोमोन व प्रकाश प्रपंच कीट भक्षी पक्षियों, कीट विनाशक रोगों, मेढ़क आदि का उपयोग समन्वित रूप से किये जाने के प्रयोग सफल हुए है। नीम की पत्ती, बीजों की खली एवं तेल का प्रयोग कीटनाशक के रूप में किया जा सकता है। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि गोमूत्र एवं नीम की पत्ती का अर्क बनाकर भी कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

6. बायो एजेण्ट्स/ बायो पेस्टीसाइड्स का प्रयोग
एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन के अन्तर्गत बायो एजेण्ट्स/ बायो पेस्टीसाइड्स का समावेश हो जाने के कारण विभिन्न फसलों को कीट/ रोग से सुरक्षा में पर्याप्त सफलता प्राप्त हो रही है। जिन क्षेत्रों में इनका प्रयोग हो रहा है वहॉ न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई है, अपितु मानव एवं पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने में पर्याप्त सफलता मिली है।

तना/फली छेदक कीट से फसलों की रोकथाम हेतु ट्राइकोकार्ड एवं एन०पी०वी० के प्रयोग से काफी लाभ मिला है इससे न केवल खाद्यान दलहनी एवं तिलहनी फसलों को लाभ हुआ है अपितु गन्ना एवं सब्जियों पर भी इसका प्रयोग लाभप्रद रहा है। उकठा, जड़–गलन, तना गलन तथा अन्य फफूँदीजनित रोगों के उपचार हेतु ट्राइकोडरमा का प्रयोग व्यापक स्तर पर प्रारम्भ हुआ है तथा बीज शोधन में भी इसका उपयोग दिनो दिन बढ़ रहा है। प्रदेश की विभागीय आई०पी०एम० प्रयोगशालाओं में ट्राइकोडरमा, ब्यूवेरिया, बैसियाना, सूडोमोनास, मेन्टाराइजियम तथा एन०पी०वी० आदि बायोएजेन्ट्स उत्पादित किये जा रहे है। जिनका उपयोग विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के अर्न्तगत आयोजित प्रदर्शनों तथा विकास कार्यों में किया जाता है।

नीम का तेल एवं बी०टी० बायोपेस्टीसाइड्स के रूप में उपलब्ध है तथा इनका प्रयोग विभिन्न कीट/रोगों के नियंत्रण/प्रबन्धन करने के लिए किया जाता है। प्रदेश में इनकी पर्याप्त उपलब्धता है। विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत इनका प्रयोग सुनिश्चित कराया जाये। बायो एजेण्ट्स/बायो पेस्टीसाइड्स के व्यापक प्रचार पर समुचित बल दिया जाये।