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वर्मी कम्पोस्ट कैसे बनाये
किसी ऊंचे छायादार स्थान जैसे पेड़ के नीचे या बगीचे में 2 मीटर ×2 मीटर ×2 मीटर क्रमशः लम्बाई, चौड़ाई तथा गहराई का गड्ढा बनायें। गड्ढे के अभाव में इसी माप की लकड़ी या प्लास्टिक की पेटी का भी प्रयोग किया जा सकता है। जिसके निचले सतह पर जल निकास हेतु 10-12 छेद बना देने चाहिए।

क- सबसे नीचे ईंट या पत्थर की 11 सेमी० की परत बनाइये फिर 2.0 सेमी० मौरंग या बालू की दूसरी तह लगाइये। इसके ऊपर 15 सेमी० उपजाऊ मिट्टी की तह लगाकर पानी के हल्के छिड़काव से नम कर दें। इसके बाद अधसड़ी गोबर डालकर एक किलो प्रति गड्ढे की दर से केचुएं छोड़ दें।

ख- इसके ऊपर 5-10 सेमी० घरेलू कचरे जैसे सब्जियों के अवशेष, छिलके आदि कटे हुए फसल अवशेष जैसे पुवाल, भूसा, जलकुंभी पेड़ पौधों की पत्तियां आदि को बिछा दें। 20-25 दिन तक आवश्यकतानुसार पानी का हल्का छिड़काव करते रहें इसके बाद प्रति सप्ताह दो बार 5-10 सेमी० सडने योग्य कूड़े कचरे की तह लगाते रहें जब तक कि पूरा गड्ढा भर न जाये। रोज पानी का छिड़काव करते रहें। कार्बनिक पदार्थ के ढेर पर लगभग 50 प्रतिशत नमी होनी चाहिए। 6-7 सप्ताह में वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है। वर्मी कम्पोस्ट बनने के बाद 2-3 दिन तक पानी का छिड़काव बन्द कर देना चाहिए। इसके बाद खाद निकाल कर छाया में ढेर लगाकर सुखा देते हैं। फिर इसे 2 मिली० छन्ने से छानकर अलग कर लेते हैं। इस तैयार खाद में 20-25 प्रतिशत नमी होनी चाहिए। इस तैयार खाद को आवश्यक मात्रा में प्लास्टिक की थैलियों में भर देते है।
इसके अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण वायु पंक्ति (विन्डरो)। विधि से भी किया जा सकता है जिसमें जीवांश पदार्थ का ढ़ेर किसी छायादार जमीन की सतह पर लगाकर किया जाता है वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण ‘रियेक्टर‘ विधि से किया जाता है जो अधिक खर्चीला तथा तकनीकी है। ऊपरी बतायी गयी विधि अत्यन्त सरल है तथा किसान आसानी से अपना सकता है।

केंचुए का कल्चर या इनाकुलम तैयार करना
केंचुए कूड़े कचरे के ढेर के नीचे से कम्पोस्ट बनाते हुए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं पूरे गड्ढे भी कम्पोस्ट तैयार होने के बाद ऊपरी सतह पर कूड़े कचरे की एक नयी सतह लगा देते हैं तथा पानी छिड़क कर नम कर देते है। इस सतह की ओर सभी केंचुए आकर्षित हो जाते हैं। इन्हें हाथ या किसी चीज से अलग कर इकट्ठा कर लेते है जिसे दूसरे नये गड्ढे में अन्तः क्रमण के लिए प्रयोग करते है।

वर्मी कम्पोस्ट के पोषक तत्व
वर्मी कम्पोस्ट के अन्य जीवांश खादों की तुलना में अधिक पोषक तत्व उपलब्ध है। इसमें नाइट्रोजन 1-1.5 प्रतिशत, फास्फोरस 1.5 प्रतिशत तथा पोटाश 1.5 प्रतिशत होता है। इसके अतिरिक्त इसमें द्वितीयक तथा सूक्ष्म तत्व भी मौजूद होते है।

वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग
धान्य फसलों, तिलहन तथा सब्जियों के लिए 5.0 से 6.0 टन वर्मी कम्पोस्ट प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई के पहले इसे खेत में बिखेर कर जुताई करके भूमि में मिला देना चाहिए। फलदार वृक्षों में 200 ग्राम प्रति पौधा तथा घास के लान में 3 किग्रा०/ 10 वर्ग मीटर की दर से प्रयोग करें।

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ

  • मृदा के भौतिक तथा जैविक गुणों में सुधार होता है।
  • मृदा संरचना तथा वायु संचार में सुधार हो जाता है।
  • नाइट्रोजन स्थरीकरण करने वाले जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
  • कूड़े कचरे से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण होता है।
  • वर्मी कम्पोस्ट एक लघु कुटीर उद्योग के रूप में रोजगार के नये अवसर प्रदान करता है।
  • फलों सब्जियों तथा खाद्यान्नों की गुणवत्ता बढ़ती है तथा उनके उपज में भी वृद्धि होती है।
  • यह रसायनिक उर्वरक की खपत कम करके मृदा स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने का प्रभावी उपाय है।

3. जैव उर्वरक
जैव उर्वरक विशिष्ट प्रकार के जीवाणुओं का एक विशेष प्रकार के माध्यम, चारकोल, मिट्टी या गोबर की खाद में ऐसा मिश्रण है जो कि वायु मण्डलीय नत्रजन को चागिकीकरण द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती है या मिट्टी में उपलब्ध अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील अवस्था में परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध कराता है। जैव उर्वरक रसायनिक उर्वरकों का विकल्प तो नहीं है परन्तु पूरक अवश्य है। इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की 1/3 मात्रा तक की बचत हो जाती है।

जैव उर्वरकों का वर्गीकरण
1. नाइट्रोजन पूर्ति करने वाले जैव उर्वरक

अ. राइजोबियम जैव उर्वरक
ब. एजोटोवैक्टर
स. एजोस्पाइरिलम
द. नील हरित शैवाल

2. फास्फोरसधारी जैव उर्वरक (पी०एस०बी०)
अ) राइजोबियम जैव उर्वरक

यह जीवाणु सभी दलहनी फसलों व तिलहनी फसलों जैसे सोयाबीन और मूंगफली की जड़ों में छोटी-छोटी ग्रन्थियों में पाया जाता है जो सह जीवन के रूप में कार्य करें वायु मण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन को पौधों को उपलब्ध कराता है। राइजोबियम जीवाणु अलग-अलग फसलों के लिए अलग-अलग होता है। इसलिए बीज उपचार हेतु उसी फसल का कल्चर प्रयोग करना चाहिए।

ब) एजोटोवैक्टर
यह भी एक प्रकार का जीवाणु है जो भूमि में पौधे की जड़ की सतह पर स्वतंत्र रूप में रहकर आक्सीजन की उपस्थिति में वायुमण्डलीय नत्रजन को अमोनिया में परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध कराता है। इसके प्रयोग से फसलों की उपज में 10-15 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाती है। इसका प्रयोग सभी तिलहनी, अनाजवाली, सब्जी वाली फसलों में किया जा सकता है।

स) एजोस्पाइरिलम
यह भी एक प्रकार का जीवाणु है जो पौधों की जड़ों के पास रहकर, वायुमण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन पौधों को उपलब्ध कराता है इसका प्रयोग अनाज की चौड़ी पत्ती वाली फसलों जैसे ज्वार, गन्ना तथा बाजरा आदि में किया जाता है।

द) नील हरित शैवाल
नील हरित शैवाल भारत जैसे गर्म देशों की क्षारीय तथा उदासीन मिटि्टयों में अधिकता से पाई जाती है। इसकी कुछ प्रजातियों वायुमण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करके पौधों को नत्रजन उपलब्ध कराती है। नील हरित शैवाल का प्रयोग केवल धान की फसल में किया जा सकता है। रोपाई के 8-10 दिन बाद दस किलोग्राम प्रति हे० हिसाब से खड़ी फसल में छिड़का जाता है। तीन सप्ताह तक खेत में पानी भरा रहना आवश्यक है। इसके प्रयोग से धान की खेती में लगभग 25-30 किग्रा० नाइट्रोजन अथवा 50-60 किग्रा० यूरिया प्रति हेक्टेयर की बचत की जा सकती है।

फास्फोरसधारी जैव उर्वरक
यह जीवित जीवाणु तथा कुछ कवकों का चारकोल, मिट्टी अथवा गोबर की खाद में मिश्रण है जो मिट्टी में उपस्थित अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील सभी प्रकार की फसलों में किया जा सकता है और लगभग 15-20 किग्रा० प्रति हे० फास्फोरस की मात्रा की बचत की जा सकती है।