कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

(2) टांका का भरना
टांका भरते समय विशेष ध्यान देना चाहिए कि इसके भरने की प्रक्रिया एक ही दिन में समाप्त हो जाये। इसके लिए आवश्यक है कि कम से कम दो टैंकों का निर्माण किया जाये जिससे कि सभी सामग्री इकट्ठा होने पर एक ही दिन में टैंक भरने की प्रक्रिया पूरी हो सके। टैंक भरने का क्रम निम्न प्रकार है

पहली परत
व्यर्थ पदार्थों की 6 इंच की ऊंचाई तक भरते हैं। इस प्रकार व्यर्थ पदार्थों की 30 घन फुट में लगभग एक कुन्तल की जरूरत होती है।

दूसरी परत
गोबर के घोल की होती हैं इसके लिए 150 लीटर पानी में 4 किलोग्राम गोबर अथवा बायोगैस संयंत्र से प्राप्त गोबर के घोल की ढाई गुना ज्यादा मात्रा में प्रयोग में लाती है। इस घोल की व्यर्थ पदार्थों द्वारा निर्मित पहली परत पर अच्छी तरह से भीगने देते हैं।

तीसरी परत
छनी हुई सूखी मिट्टी की प्रति परत आधा इंच मोटी दूसरी परत के ऊपर बिछा कर समतल कर लेते है।

चौथी परत
इस परत को वास्तव में परत न कहकर पानी की छींटें कह सकते हैं। इस लिए आवश्यक है कि टैंक में लगायी गयी परतें ठीक से बैठ जायें।

इस क्रम को क्रमशः टांका के पूरा भरने तक दोहराते हैं। टैंक भर जाने के बाद अन्त में 2.5 फुट ऊंचा झोपड़ी नुमा आकार में भराई करते हैं। इस प्रकार टैंक भर जाने के बाद इसकी गोबर व गीली मिट्टी के मिश्रण से लेप कर देते हैं। प्रायः यह देखा गया है कि 10 या 12 परतों में गड्ढा भर जाता है। यदि नादेप कम्पोस्ट की गुणवत्ता में अधिक वृद्धि करती है तो आधा इंच मिट्टी की परतों के ऊपर 1.5 किलोग्राम जिप्सम 1.5 किलोग्राम राक फास्फेट + एक किग्रा० यूरिया का मिश्रण बनाकर सौ ग्राम प्रति परत बिखेरते जाते हैं। टांका भरने के 60 से 70 दिन बाद राइजोबियन + पी०एस०बी० + एजोटोबैक्टर का कल्चर बनाकर मिश्रण को छेदों के द्वारा प्रविष्ट करा देते हैं।

टांका भरने के 15 से 20 दिनों बाद उसमें दरारे पड़ने लगती हैं तथा इस विघटन के कारण मिश्रण टैंक में नीचे की ओर बैठने लगता है। ऐसी अवस्था में इसे उपरोक्त बताई गई विधि से दुबारा भरकर मिट्टी एवं गोबर के मिश्रण से उसी प्रकार लीप दिया जाये जैसा कि प्रथम बार किया गया था। यह आवश्यक है कि टांका में 60 प्रतिशत नमी का स्तर हमेशा बना रहे। इस तरह से नादेप कम्पोस्ट 90 से 110 दिनों में बनकर प्रयोग हेतु तैयार हो जाती है। लगभग 3.0 से 3.25 टन प्रति टैंक नादेप कम्पोस्ट बनकर प्राप्त होती है तथा इसका 3.5 टन प्रति हैक्टेयर की दर से खेतों में प्रयोग करना पर्याप्त होता है। इस कम्पोस्ट में पोषक तत्वों की मात्रा नत्रजन के रूप में 0.5 से 1.5 फास्फोरस के रूप में 0.5 से 0.9 तथा पोटाश के रूप में 1.2 से 1.4 प्रतिशत तक पायी जाती है। नादेप टांका 10 वर्ष तक अपनी पूरी क्षमता से कम्पोस्ट बनाने में सक्षम रहता है।

नादेप कम्पोस्ट बनाने हेतु प्रति टांका निर्माण में लगभग दो हजार रूपये की लागत आती है। यदि 6 टांका का निर्माण कर अन्तराल स्वरूप एक टांका भरकर कम्पोस्ट बनाई जाये तो गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व शिक्षित बेरोजगारों को चार हजार रूपये प्रति माह के हिसाब से आर्थिक लाभ हो सकता है।

2. वर्मी कम्पोस्ट-एक उत्तम जैविक खाद
वर्मी कम्पोस्ट निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका केचुओं की है जिसके द्वारा कार्बनिक/जीवांश पदार्थों को विघटित करके/ सड़ाकर यह खाद तैयार की जाती है। यही वर्मी कम्पोस्ट या केंचुए की खाद कहलाती है।
वर्मी कम्पोस्टिंग कृषि के अवशिष्ट पदार्थ, शहर तथा रसोई के कूड़े कचरे को पुनः उपयोगी पदार्थ में बदलने तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने की एवं प्रभावशाली विधा है।
वर्मी कम्पोस्ट बनाने में किन-किन कार्बनिक पदार्थों का प्रयोग किया जा सकता है

(अ). कृषि या फसल अवशेष
पुवाल, भूसा, गन्ने की खाई, पत्तियां, खरपतवार, फूस, फसलों के डंठल, बायोगैस अवशेष, गोबर आदि।

(ब). घरेलू तथा शहरी कूड़ा कचरा
सब्जियों के छिलके तथा अवशेष, फलों के छिलके तथा अवशेष, फलों के छिलके तथा सब्जी मण्डी का कचरा, भोजन का अवशेष आदि।

(स) कृषि उद्योग सम्बन्धी व्यर्थ पदार्थ
वनस्पति तेल शोध मिल, चीनी मिल, शराब उद्योग, बीज तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तथा नारियल उद्योग के अवशिष्ट पदार्थ।

केचुओं की प्रजातियां
कम्पोस्ट बनाने की सक्षम प्रजातियों में मुख्य रूप से ‘इसेनिया फोटीडा‘ तथा ‘इयू ड्रिल्स इयूजीनी‘ है जिन्हें केचुयें की लाल प्रजाति भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त ‘पेरियानिक्स एक्सवकेटस‘, ‘लैम्पीटो माउरीटी,‘ डावीटा कलेवी‘ तथा डिगोगास्टर बोलाई प्रजातियां भी है जो कम्पोस्टिंग में प्रयोग की जाती हैं परन्तु ये लाल केचुओं से कम प्रभावी है।