कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

बासमती एवं सुगंधित धान

खरीफ एग्रोक्लाइमेटिक जोनवार धान संकर धान बासमती एवं सुगंधित धान सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन जीरो टिल से बुवाई मक्का बाजरा ज्वार सॉवा कोदो राम दाना की खेती मूंगफली सोयाबीन तिल अंडी (अरण्ड) अरहर मूंग उर्द सहफसली खेती खरपतवार नियंत्रण लोबिया तोरिया हरा चारा बीज का महत्त्व क्रॉस एवं मोथा ऊसर सुधार कार्यक्रम सनई की खेती जैव उर्वरक महत्ता एवं उपयोग फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य पोषक तत्व प्रबंधन फसल चक्र यंत्र एवं मशीनरी खरीफ फसलों के आंकड़े (परिशिष्ट एक एवं दो ) एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम का मासिक कैलेंडर सघन पद्धतियाँ 2016 मशरूम की खेती जैविक खेती फसलों के अवशेष धान की बुवाई रक्षा रसायन प्रमुख रासायनिक उर्वरक खरीफ फसलों के आंकड़े नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान सत्यापित प्रजातियां महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

9. सिंचाई प्रबंधन
धान की फसल को सिंचाई की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ती है इसलिए धान की फसल को पानी की उचित उपलब्धता वाले स्थान पर ही उगाया जाता है। पानी का उचित प्रबंध न होने के कारण इसकी उपज में काफी गिरावट आ जाती है। दाना बनने की अवस्था तक खेत में पानी का स्तर बनाये रखना चाहिए। पर्याप्त वर्षा न होने की अवस्था में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना अधिक उपज के लिए आवश्यक है। फसल की कटाई के 15 दिन पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए। ताकि अगली फसल की बुआई सही समय पर की जा सके।

10. खरपतवार नियंत्रण
पृष्ठ के अनुसार।

11. कीट एवं रोग नियंत्रण
धान की फसल में अन्य धान्य फसलों की तुलना में सबसे अधिक कीट एवं रोग नुकसान पहॅुचाते है। बासमती धान में कीट एवं रोगों के प्रकोप से उपज के साथ-साथ गुणवत्ता में भी हास होता है। जिसमें बासमती चावल की मॉग स्थानीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ारों में काफी घट जाती जिसके परिणाम स्वरुप किसानो को भी भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है।

बासमती धान को निम्नलिखिति कीट नुकसान पहॅुचाते हैः

  • धान का भूरा एवं सफेद फुदका
  • धान का तना बेधक
  • गन्धी कीट
  • धान का पत्ती लपेटक कीट

बासमती धान की निम्नलिखित रोग मुख्य रूप से अधिक हानि पहॅुचाते है

  • धान का झोंका (ब्लास्ट) रोग
  • धान का भूरा धब्बा रोग
  • धान का पर्णच्छद झुलसा रोग
  • धान की जीवाणु पत्ती झुलसा रोग
  • धान का खैरा रोग
  • धान का मिथ्या कण्डुआ रोग
  • धान का पर्णच्छद विगलन रोग

उपरोक्त कीटों एवं रोगों के नियत्रंण के लिए रासायनिक तथा जैविक साधनों का उचित मिश्रण बासमती धान की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए उचित माना जाता है। जैविक नियंत्रण से धान के मित्र कीटों की संख्या भी बनी रहती है।

तना बेधक के नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप 20 x 25 मीटर की दूरी पर 20 ट्रैप प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में लगा देनी चाहिए। शुरू में इसकी ऊँचाई लगभग 50 सेमी० तथा जैसे-जैसे फसल बढती हैं इसकी उचाई को फसल की ऊँचाई से 25-30 सेमी. बढ़ाते रहना चाहिए। यदि खेत में (रोपाई से कल्ले फूटने तक) प्रति वर्ग मी. एक मादा कीट या 5-6 प्रतिशत मृत पौधें मिले तो कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या फिप्रोनिल 0.3 जी. प्रतिशत (दानेदार चूर्ण) नामक रसायन की 19 किग्रा मात्रा को खेत में अच्छी प्रकार बिखेर दें तथा 5-6 दिनों तक 3-4 सेमी. पानी बनाये रखें तथा कल्ले फूटने के बाद फिप्रोनिल 5 प्रतिशत घुलनशील द्रव्य 1 ली. मात्रा का प्रति हे. की दर से छिड़काव करना चाहिए। यदि खेत में पत्ती लपेटक कीट द्वरा ग्रसित 2 मुड़ी हुई पत्ती प्रति हिल दिखाई दे तो उपरोक्त रसायन का प्रयोग करना चाहिए। खड़ी फसल में फुदके दिखाई दे तो खेत से 3-4 दिन के लिए पानी निकालने से इनकी संख्या काफी कम हो जाती है। फुदके नियंत्रण के लिए 8.10 फुदके/हिल होने पर इमिडाक्लोप्रिड 25 ग्रा सक्रिय तत्व प्रति है. की दर से (140 मिली. 17.8 प्रतिशत घुलनशील द्रव्य) अथवा फिप्रोनिल 50 प्रतिशत सक्रिय पदार्थ/है. (1 ली.5 ग्राम घुलनशील द्रव्य/है.) के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। जिससे पूरे पौधें नीचे तक भीग जाये। फिप्रोनिल रसायन तना छेदक कीट के लिए भी प्रभावशाली है।

जीवाणु झुलसा बीमारी के फैलने से रोकने के लिए जल भराव नही होना चाहिए। साथ ही नाइट्रोजन का प्रयोग भी रोक देना चाहिए। यदि बीमारी का प्रकोप अधिक हो तो 15 ग्राम स्टेप्टोमाइसीन सल्फेट 90 प्रतिशत + टेट्रासाइक्लीन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत, 500 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड का 500 लीटर नानी में घोल बनाकर/हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। पर्णच्छद झुलसा, पर्णच्छद विगलन तथा झोंका रोगों की रोकथाम के लिए स्यूडोमोनास फ्लोरीसेन्स तथा ट्राईकोडरमा (1.1 अनुपात) का 5 ग्राम या 1 लीटर प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी./काबेर्न्नडाजिम 50 डब्ल्यू. पी. के जलीय घोल का छिड़काव/हे. की दर से करना चाहिए तथा दूसरा छिड़काव 10 दिन के बाद करने से इन रोगों का प्रभाव काफी कम हो जाता है।

12. कटाई एवं मड़ाई
बासमती धान के 90 प्रतिशत से अधिक दानों का रंग जब हरे से पीले सुनहरें रंग में परिवर्तित हो जाए तो फसल को काट लेना चाहिए। देर से फसल की कटाई करने पर दाने छिटक कर नीचे गिर जाते है फलस्वरूप उपज से काफी हास होता है। कटाई को तुरन्त बाद मड़ाई कर लेनी चाहिए। देरी से मड़ाई करने पर बासमती चावल की गुणवत्ता में कमी आती है।