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बासमती एवं सुगंधित धान

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4. बीज शोधन

नर्सरी डालने से पूर्व बीज शोधन अवश्य कर लें। इसके लिये जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणु धारी रोग की समस्या हो वहां पर 25 किग्रा. बीज के लिए 4 ग्राम स्ट्रेपटोसाइक्लीन या 40 ग्राम प्लांटोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगो दें। दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी डालें। यदि शाकाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों में नहीं है तो 25 किग्रा. बीज को रातभर पानी में भिगाने के बाद दूसरे दिन निकाल कर अतिरिक्त पानी निकल जाने के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को पानी में मिलाकर बीज में मिला दिया जाये इसके बाद छाया में अंकुरित करके नर्सरी में डाली जाये। बीज शोधन हेतु बायोपेस्टीसाइड का प्रयोग किया जाये।

5. बीज की मात्रा तथा बीजोपचार
प्रजाति के अनुसार बासमती धान के लिए 25-30 किग्रा. बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। 2 ग्राम⁄किग्रा. बीज की दर से कार्बेन्डाजिम द्वारा उपचारित करके बोना चाहिए।

6. पौध तैयार करना
बासमती धान की पौध तैयार करने के लिए उपजाऊ अच्छे जल निकास तथा सिंचाई स्त्रोत के पास वाले खेत का चयन करना चाहिए। 700 वर्ग मी. क्षेत्रफल में 1 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए पैध तैयार की जा सकती है। बीज की बुवाई का उचित समय जल्दी पकने वाली प्रजातियों के लिए जून का दूसरा पखवाड़ा है तथा देर से पकने वाली प्रजातियॉ की बुवाई मध्य जून तक कर देनी चाहिए।
पौधशाला में सड़ा हुआ गोबर या कम्पोस्ट खाद को मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए। खेत को पानी से भरकर दो या तीन जुताई करके पाटा लगा देना चाहिए । खेत को छोटी–छोटी तथा थोड़ा ऊंची उठी हुई क्यारियों में बांट लेना चाहिए। बीज की बुवाई से पहले 10 वर्ग मी. क्षेत्र में 225 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 100 ग्राम यूरिया तथा 200 ग्राम सुपर फास्फेट को अच्छी तरह मिला देना चाहिए। आवश्यकतानुसार निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कीट, रोग तथा खरपतवार की रोकथाम उचित प्रबन्धन करना चाहिए। खेत में ज्यादा समय तक पानी रूकने नहीं देना चाहिए।

7. रोपाई के लिए खेम की तैयारी एवं रोपाई का समय
ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेत में रोपाई के 10 से 15 दिन पूर्व पानी भर देने से पिछली फसल के अवशेष नष्ट हो जाते हैं। खेती की मिट्टी को मुलायम व लेहयुक्त बनाने के लिए पानी भरे खेत की 2-3 जुताई करके पाटा लगाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। बासमती धान की रोपाई का समय इसकी उपज तथा गुणवत्ता को प्रभावित करता है। 25-30 दिन की पौध बासमती धान की रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। बासमती धान को पूसा बासमती -1 प्रजाति को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जुलाई के प्रथम सप्ताह में लगा लेना चाहिए तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस प्रजाति को 15 जुलाई तक रोपना चाहिए । बासमती धान की टाइप 3, बासमती 370, तरावड़ी बासमती आदि प्रजातियों को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जुलाई के अन्तिम सप्ताह व पूर्वी उत्तर प्रदेश में अगस्त के प्रथम पक्ष में लगाना चाहिए। जुलाई माह बासमती धान की रोपाई के लिए उत्तम माना जाता है। 20X15 सेमी. की दूरी पर दो से तीन पौधों की रोपाई उचित रहती है। देर से रोपाई करने पर 15X15 सेमी. की दूरी पौध की रोपाई करनी चाहिए। पराम्परागत बासमती प्रजातियों को पानी भराव वाले खेतों में नही बोना चाहिए। इसमें धान की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

8. खाद एवं उर्वरक
बासमती धान में खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता सामान्य धान तुलना में आधी होती है। परन्तु नयी उन्नत प्रजातियों की लम्बाईक् कम होने के कारण नत्रजन की मॉग परम्परागत प्रजातियों की तुलना में अधिक होती है।
नयी प्रजातियों (पी बी 1, पंत सुगंधा 115, पंत सुगंधा 2, पूसा सुगन्धा-3 तथा पूसा आर.एच.10) में 90-100 किग्रा नत्रजन (200 किग्रा यूरिया या 500 किग्रा अमोनियम सल्फेट) 40 किग्रा फास्फोरस (250 किग्रा. सिगल सुपर फास्फेट) तथा 30 किग्रा. पोटाश (50 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश) देना चाहिए । परम्परागत किस्मों में 50-60 किग्रा. नत्रजन की आवश्यकता पड़ती है तथा फास्फोरस और पोटाश की आवश्यकता, नयी किस्मों के समान होती है। खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के उपरान्त करना चाहिए। जिंक, फास्फोरस, एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा का प्रयोग खेत की तैयारी के समय कर देना चाहिए। नत्रजन की बची हुई मात्रा का 1/3 भाग 7 दिन पर शेष 1/3 मात्रा किल्ले एवं शेष एक तिहाई मात्रा बालियां निकलते समय प्रयोग करना चाहिए। 25-30 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय डाल देना चाहिए।
बासमती धान की उर्वरक मॉग कम होने के कारण इसकी कार्बनिक खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। कार्बनिक खेती में पोषण तत्वों की आपूर्ति गोबर की खाद कम्पोस्ट हरी खाद तथा मुर्गी की बीट आदि स्त्रोत से पूरी की जा सकती है। कार्बनिक खादों को खेत में रोपाई से दो सप्ताह पहले मिला देना चाहिए। इसके लिए खरपतवार रोग एवं कीट के नियंत्रण के लिए जैविक संसाधनों का प्रयोग किया जाता है।