कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

मिट्टी की जाँच

जैव उर्वरक प्रयोग विधि

जैव उर्वरकों को चार विभिन्न तरीकों से खेती में प्रयोग किया जाता है।

  • बीज उपचार विधि: जैव उर्वरकों के प्रयोग की यहाँ सर्वोत्तम विधि है। ½ लीटर पानी में लगभग 50 ग्राम गुड़ या गोन्द के साथ जैव उर्वरक अच्छी तरह मिला लेते है जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाए। इसके उपरान्त बीजों को छायादार जगह में सुखा लेते हैं। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिए।
  • पौध जड़ उपचार विधि: धान तथा सब्जी वाली फसलें जिनके पौधों की रोपाई की जाती है जैसे टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, प्याज इत्यादि फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए किसी चौड़े व छिछले बर्तन में साथ मिला लेते हैं। इसके उपरांत नर्सरी में पौधों को उखाड़ कर तथा जड़ो में मिट्टी साफ करने के पश्चात 50-100 पौधों को बंडल में बांधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो देते है। इसके बाद तुरंत रोपाई कर देते है
  • कन्द उपचार: गन्ना, आलू, अदरक, अरबी जैसी फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को उपचारित किया जाता है। एक किलोग्राम जैव उर्वरकों को 20-30 लीटर घोल में मिला लेते है। इसके उपरांत कन्दों को 10 मिनट तक घोल में डुबोकर रखने के पश्चात बुवाई कर देते है
  • मृदा उपचार विधि: 5-10 किलोग्राम जैव उर्वरक (एजोटोबैक्टर व पी.एस.बी. आधा आधा) 70-100 किग्रा. मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण तैयार करके रात भर छोड़ दें। इसके बाद अंतिम जुताई पर खेत में मिला देते है।

जैव उर्वरकों के लाभ

  • यह उपज में लगभग 10-15 प्रतिशत की वृद्धि करते है।
  • यह रासायनिक खादों विशेष रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस की जरूरत का 20-25 प्रतिशत तक पूरा कर सकते है।
  • फसलों की वृद्धि में सहायक होते है।
  • जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते है।
  • मृदा जनित बीमारियों तथा सूखे से फसल को बचाते है।

जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियां

  • जैव उर्वरक को छाया में सूखे स्थान पर रखें।
  • फसल के अनुसार ही जैव उर्वरक का चुनाव करें।
  • उचित मात्रा का प्रयोग करें।
  • जैव उर्वरक खरीदते समय उर्वरक का नाम बनाने की तिथि व फसल का नाम इत्यादि ध्यान से देख लें।
  • जैव उर्वरक का प्रयोग समाप्ति की तिथि के पश्चात न करें।
  • जैव उर्वरक को कीट नाशक के साथ प्रयोग न करें।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

यह भारत सरकार, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग एवं उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा संयुक्त रूप से चलायी जा रही योजना है। इसका कार्यान्वयन उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग के माध्यम से रबी 2015-2016 से प्रारम्भ किया गया है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का उद्देशय प्रत्येक किसान को उसके खेत की मृदा के पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देना है और उन्हें उर्वरकों की सही मात्रा के प्रयोग और आवश्यक मृदा सुधारकों के संबंध में सलाह देना है ताकि लंबी अवधि के लिए मृदा स्वास्थ्य को कायम रखा जा सके।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड

मृदा स्वास्थ्य कार्ड मृदा परीक्षण जाँच रिपोर्ट कार्ड है जिसमें सिंचित दशा में 2.5 हेक्टेयर तथा असिंचित 10 हेक्टेयर क्षेत्रफल से एक नमूना ग्रिड़ के आधार पर लिया जाता है ग्रिड़ के अन्तर्गत आने वाले समस्त कृषकों को एक समान मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिया जायेगा। इसमें 12 पैरामीटर (मुख्य पोषक तत्व- मृदा पी०एच०, ई० सी०, जीवांश कार्बन उपलब्ध (नत्रजन), उपलब्ध फॉस्फोरस, उपलब्ध पोटाश, द्वितीय पोषक तत्व- गंधक, सूक्ष्म पोषक तत्व- जिंक, लोहा, मैग्नीज, तांबा, बोरॉन, का परीक्षण) जाँच / परीक्षणोपरांत ही कृषको को निःशुल्क मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जा रहा है।

मृदा परीक्षण के उद्देश्य

  • मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों का सही- सही निर्धारण कर मृदा स्वास्थ्य कार्डों के माध्यम से कृषकों तक पहुंचाना।
  • विभिन्न फसलों की दृष्टि से पोषक तत्वों की कमी का पता करके किसानों को स्पष्ट सूचना देना।
  • मृदा पोषक तत्वों की स्थिति ज्ञात करना और उसके आधार पर फसलों के अनुसार उर्वरकों / खादों को डालने की संस्तुति करना।
  • मृदा की विशिष्ट दशाओं का निर्धारण करना, जिसमें मृदा को कृषि विधियों और मृदा सुधारको की सहायता से ठीक किया जा सके।
  • संतुलित उर्वरकों के प्रयोग को प्रोत्साहित करना।