कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

पुनर्गठन परियोजना

उत्तर प्रदेश वाटर सेक्टर रीस्ट्रक्चरिंग परियोजना द्वितीय चरण

प्रस्तावना

हमारे कृषि प्रधान भारत में जल का अधिक महत्व है। जल वनस्पति एवम् प्राणियों के जीवन का आधार है उसी से हम मनुष्यों, पशुओं एवम् वृक्षों को जीवन मिलता है। यूं तो सम्पूर्ण पृथ्वी में 75 प्रतिशत पानी है किन्तु पीने योग्य जल मात्र 1 प्रतिशत ही है इसलिए जल का विशेष महत्व है। भारत नदियों का देश कहा जाता है। पहले जमाने में, गंगाजल वर्शों तक बोतलों डिब्बों में बन्द रहने पर भी खराब नहीं हुआ करता था, परन्तु आज जल- प्रदूषण के कारण अनेक स्थानों पर गंगा-यमुना जैसी नदियों का जल भी छूने को जी नहीं करता। हमें इस जल को स्वच्छ करना है एवं भविष्य में इसे प्रदूषित होने से बचाना है।

जल संकट को दूर करने के लिए सरकार की ओर से निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। गांव हो या शहर हमे वर्तमान समय से जल की बूंद -बूंद को बुद्धिमत्ता से प्रयोग करना है ताकि सबके पीने योग्य जल मिले एवम् भविष्य की पीढ़ी को भी पर्याप्त मात्रा में जल नसीब हो। भगवान कभी वो दिन न दिखाए जब देश के राज्य एक.दूसरे पर पानी के लिए विवाद खड़ा करें। हमें नये-नये तरीकों से वर्षा ऋतु के पानी को बचाना है। अन्धाधुन्ध भूगर्भ जल के दोहन एवं सही ढंग से वर्षा जल के संरक्षण एवं सदुपयोग न हो पाने के कारण भूमि में उपलब्ध पानी का स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। अतः वर्तमान में जल प्रबन्धन परम आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश प्रचुर जल संसाधनों से सम्पन्न राज्य है परन्तु अनवरत् रूप से बढ़ती हुई जनसंख्या तथा आधुनिक जीवन शैली के कारण जल की मांग तो बढ़ ही रही है साथ-साथ जल संसाधनों का अव्यवस्थित उपयोग भी तेजी से हो रहा है। आज आवश्यक इस बात की है कि किसान भाई एवं आम जन जल संसाधनों के व्यवस्थित सदुपयोग के प्रति जागरूक हों, ऐसे में किसान सिंचाई स्कूलों के माध्यम से कृषि विविधीकरण कार्यक्रमों को अपना कर कृषि उत्पादन बढ़ाकर अतिरिक्त आय प्राप्त करते हुए अपनी व प्रदेश की उपलब्धियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

खेती में जल की अधिकता व कमी दोनों स्थितियां विनाशकारी है। परीक्षणों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि नहरी सिंचित क्षेत्र की उत्पादकता ट्यूबवेल सिंचित क्षेत्र की उत्पादकता से कम होती है, जिसका कारण यह है कि नहर का पानी सुगम रूप से उपलब्ध होने के कारण खेतों में फसल की मांग से अधिक भर दिया जाता है तथा प्रायः फसल की क्रान्तिक मांग पर नहर में पानी नहीं उपलब्ध होता है। उपलब्ध जल का सदुपयोग करते हुए कम से कम जल का प्रयोग कर अधिकतम उपज के परिणामस्वरूप कृषकों की आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से फार्मर फील्ड स्कूल की तर्ज पर किसान सिंचाई स्कूल संचालित करने की परिकल्पना की गयी है। इस प्रकार यह परियोजना नहरी जल के समुचित उपयोग पर आधारित है।

परिदृश्य 2050 को संज्ञान में लाने पर खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता में लगभग 2.5 गुना बढ़ोत्तरी आवश्यक होगी। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु जल का संतुलित एवं समन्वित उपयोग किया जाना परम आवश्यक है। नदी बाहुल्य प्रदेश होने तथा उपलब्ध जल का समान एवं सन्तुलित वितरण करने के उद्देश्य से नहरों का जाल बिछाया गया है, फिर भी मीठे पानी का एकमात्र स्रोत वर्षा जल का लगभग 50 प्रतिशत पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। इसी के साथ यदि हम देखे तो सही ढंग से मेड़बन्दी न होने के कारण लगभग 16000 टन उपजाऊ मिट्टी प्रति वर्ष वर्षा जल के साथ बहकर चली जाती है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना उचित होगा कि एक इंच उपजाऊ भूमि बनने में 400 से 600 वर्श लगते हैं।

क्र0सं0 संसाधन इकाई संख्या
1 कैनाल सिस्टम की कुल लम्बाई किमी0 73997
2 ड्रेन्स की कुल लम्बाई किमी0 49010
3 मेजर पम्प कैनाल्स न0 28
4 माइनर लिफट कैनाल्स न0 246
5 स्टेट ट्यूबवेल न0 30133
6 मेजर रिजरवायर्स न0 71
7 मेजर बैराज न0 25
8 प्रदेश में कृषि का कुल क्षेत्रफल लाख हे0 188-40
9 इरीगेंशन पोटेन्शियल क्रियेटेड लाख हे0 126-51
10 इरीगेंशन पोटेन्शियल यूटीलाइज्ड लाख हे0 65