कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

बाजरा

खरीफ एग्रोक्लाइमेटिक जोनवार धान संकर धान बासमती एवं सुगंधित धान सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन जीरो टिल से बुवाई मक्का बाजरा ज्वार सॉवा कोदो राम दाना की खेती मूंगफली सोयाबीन तिल अंडी (अरण्ड) अरहर मूंग उर्द सहफसली खेती खरपतवार नियंत्रण लोबिया तोरिया हरा चारा बीज का महत्त्व क्रॉस एवं मोथा ऊसर सुधार कार्यक्रम सनई की खेती जैव उर्वरक महत्ता एवं उपयोग फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य पोषक तत्व प्रबंधन फसल चक्र यंत्र एवं मशीनरी खरीफ फसलों के आंकड़े (परिशिष्ट एक एवं दो ) एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम का मासिक कैलेंडर सघन पद्धतियाँ 2016 मशरूम की खेती जैविक खेती फसलों के अवशेष धान की बुवाई रक्षा रसायन प्रमुख रासायनिक उर्वरक खरीफ फसलों के आंकड़े नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान सत्यापित प्रजातियां महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर
  • एट्राजीन 2 किग्रा०प्रति हे० अथवा 800 ग्राम प्रति एकड़ मध्यम से भारी मृदाओं में तथा 1.25 किग्रा० प्रति हे० अथवा 500 ग्राम प्रति एकड़ हल्की मृदाओं में बुवाई के तुरन्त 2 दिनों में 500 लीटर/हे० अथवा 200 लीटर / एकड़ पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।
    इस शाकनाशी के प्रयोग से एकवर्षीय घासकुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बहुत की प्रभावी रूप से नियमित हो जाते है। इस रसायन द्वारा विशेषरूप से पथरचटा (ट्रइरगन्थिया) भी नष्ट हो जाता है।
  • जहॉ पर पथरचटा की समस्या नहीं है वहॉ पर लासो 50 ई.सी.(एलाक्लोर) 5 लीटर प्रति एकड़ बुवाई के दो दिनों के अन्दर प्रयोग करना आवश्यक है।
  • हार्डी खरपतवारों जैसे कि वन पट्टा (ब्रेचेरिया रेप्टान्स), (रसभरी कोमेलिया वैफलेन्सिस) को नियन्त्रित करने हेतु बुवाई के दो दिनों के अन्दर एट्राटाफ 600 ग्राम प्रति एकड़ अच्छी+ स्टाम्प 30 ई.सी. ट्रइफ्लूरेलिन प्रत्येक 1 लीटर प्रति एकड़ अच्छी तरह से मिलाकर 200 लीटर पानी के साथ प्रयोग करने पर आशातीत परिणाम आते है।

9. सिंचाई
खरीफ में फसल की बुवाई होने के कारण वर्षा का पानी ही उसके लिए पर्याप्त होता है। इसके अभाव में एक या दो सिंचाई फूल आने पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

10. फसल सुरक्षा
रोग

1. बाजरा का अरगट
पहचान

यह रोग केवल भुट्टों के कुछ दानों पर ही दिखार्इ देता हैं इसमें दाने के स्थान पर भूरे काले रंग के सींक के आकार की गांठे बन जाती है। जिन्हें स्केलेरेशिया कहते है। संक्रमित फूलों में फफूंद विकसित होती है जिनमें बाद में मधु रस निकलता है। प्रभावित दाने मनुष्यों एवं जानवरों के लिए हानिप्रद होते है।

उपचार

  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील/संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • बीजशोधन हेतु थिरम 75 प्रतिशत डब्लू०एस०2.5 ग्राम अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू०पी० की 2.0 ग्राम अथवा मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू०एस० की 6.0 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।
  • अप्रमाणित बीजों को 20 प्रतिशत नमक के घोल से शोधित कर साफ पानी से 4-5 बार धोकर बुवाई के लिए प्रयोग करना चाहिए।
  • निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये।
  • जिरम 80 प्रतिशत डब्लू०पी०2.0 किग्रा० अथवा मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू०पी० 2.0 किग्रा०

2. बाजरा का कण्डुआ
पहचान

कन्डुआ रोग से बीज आकार में बड़े गोल अण्डाकार हरे रंग के होते हैं] जिसमें काला चूर्ण भरा होता हैं।

उपचार
  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील/संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • रोग ग्रसित बालियों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए।
  • बीजशोधन हेतु थिरम 75 प्रतिशत डब्लू०एस० 2.5 ग्राम अथवा कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू०पी० की 2.0 ग्राम अथवा मेटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू०एस० की 6.0 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।
  • निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए
  • जिरम 80 प्रतिशत डब्लू०पी० की 2.0 ग्राम अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू०पी० की 2.0 ग्राम अथवा मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू०पी० 2.0 किग्रा०

3. बाजरे की हरित बाली रोग
पहचानः
इनमें बाजरा की बालियों के स्थान पर टेढ़ी-मेढ़ी हरी-हरी पत्तियॉ सी बन जाती हैं] जिससे पूर्ण बाली झाडू के समान दिखाई देती हैं। पौधों बौने रह जाते हैं।

उपचार

  • खेत की गहरी जुताई करें।
  • फसल चक्र सिद्धान्त का प्रयोग करें।
  • फसल एवं खरपतवारों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • सिंचाई का समुचित प्रबन्ध करें।
  • उन्नतशील /संस्तुत प्रजातियों की ही बुवाई करें।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू०पी० अथवा थायोफिनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्लू०पी० की 2 ग्राम मात्रा प्रति ली० पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर दो छिड़काव करना चाहिए।
  • अत्यधिक प्रकोप की दशा में ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए।

कीट

1. दीमक
खड़ी फसल में प्रकोप होने पर सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 2.5 ली० प्रति हे० की दर से प्रयोग करें।

2. सूत्रकृमि
रसायनिक नियंत्रण हेतु बुवाई से एक सप्ताह पूर्व खेत में 10 किग्रा० फोरेट 10 जी फैलाकर मिला दें।

3. तना छेदक कीट
निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसायन को प्रति हे० बुरका/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा० अथवा फोरेट 10 प्रतिशत सी०जी० 20 किग्रा० अथवा डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई०सी० 1.0 ली० प्रति हे० अथवा क्युनालफास 25 प्रतिशत ई०सी 1.50 लीटर

4. प्ररोह मक्खी
निम्नलिखित रसायन में से किसी एक रसाययन को प्रति हे० बुरकाव/500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा० अथवा फोरेट 10 प्रतिशत सी०जी० 20 किग्रा० अथवा डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई०सी० 1.0 ली० प्रति हे० अथवा क्युनालफास 25 प्रतिशत ई०सी 1.50 लीटर

मुख्य बिन्दु

  • क्षेत्र की अनुकूलता के अनूसार संस्तुत प्रजाति का शुद्ध बीज ही प्रयोग करें।
  • उपचारित बीज बोयें।
  • मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों को प्रयोग करें।
  • फूल आने पर वर्षा के अभाव में पानी अवश्य दें।
  • कीट/बीमारियों का समय से नियंत्रण अवश्य करें।