कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

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उर्द

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उर्द की खेती सामान्यतः प्रदेश के सभी जनपदों में की जाती है लेकिन लखनऊ, फैजाबाद, झांसी, चित्रकूट कानपुर एवं बरेली मण्डलों में इसकी खेती अधिक क्षेत्रफल में की जाती है।

1. भूमि की तैयारी
समुचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो तीन जुताई देशी हल से करके पाटा लगाना चाहिए।

2. बुवाई का समय
शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की बुवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक करनी चाहिए। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को जायद में भी बोया जाता है। टा-27 तथा टा-65 की बुवाई शुद्ध फसल के रूप में जुलाई के प्रथम पक्ष में तथा अरहर के साथ जून के द्वितीय पक्ष में करनी चाहिए। शेखर प्रजातियों की बुवाई 25 जुलाई से 30 अगस्त तक की जानी चाहिए। पश्चिमी भाग में हरे चारे के बाद भी बुवाई की जा सकती है।

प्रजातियां एवं उपज

प्रजातियां पकने की अवधि (दिन) बीज दर कि०ग्रा० प्रति हे० पंक्ति की दूरी से०मी० औसत उपज कु०/हे० उपयुक्त क्षेत्र
आई०पी०यू०-94-1 (उत्तरा) 75-80 15 30 12-15 जायद व खरीफ में देर से बुवाई के लिए उपयुक्त
पन्त यू०-35* 70-75 15 30 10-12 सम्पूर्ण उ०प्र०
नरेन्द्र उर्द-1* 70-80 15 30 12-15 खरीफ में बुवाई के लिए सम्पूर्ण उ०प्र०
पन्त यू-30 70-75 15 30 10-15 तदैव
आजाद उर्द-2 (हरा दाना) 75-80 15 30 12-13 सम्पूर्ण उ०प्र०
शेखर 1 80-85 12-15 35 12-15 तदैव
शेखर 3 78-80 15 30 12-13 तदैव
आजाद उर्द-3 80-85 15 30 12-14 तदैव
WBU 108 80 15 30 12-14 तदैव
शेखर 2 80-85 12-15 35 12-15 तदैव
पन्त उर्द 31 70-75 15-20 - 12-19 मोजैक अवरोधी

* यह प्रजातियां पीला चित्रवर्ण (मोजेक) के लिए सहिष्णु हैं।

4. बीज का उपचार
बीज को 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम अथवा 2.00 ग्राम थीरम से प्रति कि०ग्रा० की दर से शोधित करने के बाद उर्द के राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट से 10 कि०ग्रा० बीज का उपचार करना चाहिए। उपचार अरहर की खेती के अन्तर्गत दी गयी विधि के अनुसार करें।

5. बीज की मात्रा
विभिन्न प्रजातियों का 12-15 कि०ग्रा० प्रति हेक्टर प्रयोग करना चाहिए।

6. बुवाई
हल के पीछे कूंड़ में बुवाई करनी चाहिए। कूंड़ से कूंड़ की दूरी 30-45 से०मी० रखनी चाहिए तथा बुवाई के बाद तीसरे सप्ताह में घने पौधों को निकाल कर पौधे की दूरी 10 से०मी० कर देना चाहिए।

7. उर्वरक
10-15 कि०ग्रा० नत्रजन तथा 40 कि०ग्रा० फास्फोरस तथा 20 किग्रा० सल्फर 200 किग्रा० जिप्सम प्रति हेक्टर की दर से कूंड़ों में डालना चाहिए। दाना बनते समय 2 : यूरिया घोल का छिड़काव करने से उपज में वृद्धि होती है।

8. सिंचाई
वर्षा के अभाव में विशेष रूप से फलियां बनते समय एक सिंचाई करनी चाहिए।

9. निराई-गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण