कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

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तिल

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प्रदेश में तिल की खेती प्रमुखतया बुन्देलखण्ड की मुख्य रूप से रांकड़, पडुवा एवं अच्छे जल निकास वाली कांवर, मार भूमि में तथा मिर्जापुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, आगरा, मैनपुरी आदि जनपद में शुद्ध एवं मिलवां खेती के रूप में की जाती है। मैदानी क्षेत्रों में इसे ज्वार बाजरा तथा अरहर के साथ बोते हैं। निम्न सघन पद्धतियां अपनाकर इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

1. खेत की तैयारी
अच्छती पैदावार के लिए उत्तम जल निकास वाली भुमि की आवश्यकता होती है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व 2-3 जुताईयां कल्टीवेटर अथवा देशी हल से करना चाहिए। जुताई के समय 5 टन गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए।

2. उन्नतिशील प्रजातियाँ

प्रजातियां विशेषता पकने की अवधि (दिनो में) तेल प्रतिशत उपज (कु./हे.) उपयुक्त क्षेत्र
टा-4 फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद 90-100 40-42 6-7 मैदानी क्षेत्र
टा-12 फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद 85-90 40-45 5-6 मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र
टा-13 फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद 90-95 40-45 6-7 बुन्देलखण्ड क्षेत्र
टा-78 फलियाँ एकल, सन्मुखी 80-85 45-48 6-8 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
शेखर फलियाँ एकल, सन्मुखी 80-85 45-48 6-8 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
प्रगति फलियाँ एकल, सन्मुखी 80-85 45-48 7-9 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
तरूण फलियाँ एकल, सन्मुखी 80-85 50-52 8-9 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
आर.टी.. 351 बहुफलीय एवं सन्मुखी 80-85 50-52 9-10 सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश

3. बीज दर एवं शोधन
एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिये 3-4 किग्रा. स्वच्छ एवं स्वस्थ बीज का प्रयोग करें। बीज जनित रोगों से बचाव हेतु 2 ग्राम धीरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधन हेतु प्रयोग करें।

4. बुआई का समय एवं विधि
बुआई का उचित समय जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई का दूसरा पखवारा है। पश्चिमी उ0प्र0 में इससे पूर्व बुआई करने से फाइलोडी रोग लगने का भय रहता है। बुआई हल के पीछे लाइनों में 30 से 45 से.मी. की दूरी पर करें। बीज को कम गहराई पर बोयें। बीज का आकार छोटा होने के कारण बीज को रेत,राख या सूखी हल्की बलुई मिट्टी में मिलाकर बोयें।

5. संतुलित उर्वरकों का प्रयोग
उर्वरकों का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करें। यदि परीक्षण न कराया गया हो तो 30 किग्रा. नत्रजन 20 किग्रा. फास्फोरस तथा 20 किग्रा. गन्धक प्रति हे. की दर से प्रयोग करें। राकड़ तथा भूड़ भूमि में 20 किग्रा. पोटाश प्रति हे. का भी प्रयोग करें। नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश तथा गंधक की पूरी मात्रा, बुवाई के समय बेसल ड्रेसिंग के रूप में तथा नत्रजन की शेष मात्रा निरार्इ गुड़ाई के समय प्रयोग करें। फसल में पुष्पावस्था तथा फली बनते समय 2 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर छिड़काव करने से पैदावार में आशातीत वृद्धि होगी।

6. निराई–गुड़ाई
प्रथम निराई गुड़ाई, बुवाई के 15-20 दिनों बाद दूसरी निराई 30-35 दिन बाद करें। निराई-गुड़ाई करते समय पौधें की थिनिंग (विरलीकरण) करके उनकी आपस की दूरी 10 से 12 सेमी. कर लें। एलाक्लोर 50 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हे0 बुआई के 3 दिन के अन्दर प्रयोग करने से खरपतवारों का नियन्त्रण हो जाता है।

7. सिचाई
जब पौधों में 50-60 प्रतिशत फली लग जाय और उस समय नमी की कमी हो तो एक सिंचाई करना आवश्यक है।

8. कटाई–मड़ाई
फसल की कटाई उचित अवस्था पर करके बण्डल बनाकर खलिहान ऊर्द्धाकार रखें। बण्डल सूख जाने पर पक्के फर्श या तिरपाल पर ही तिल की मड़ाई करें। गोबर के लेप खलिहान में मड़ाई न करे इससे निर्यात की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।

9. फसल सुरक्षा
कीट

  • पत्ती व फल की सूण्डी : इनकी सूँडियाँ कोमल पत्तियों तथा फलियों को खाती है तथा जाला बनाकर बाँध देती है।
  • जैसिड – पत्तियों का रस चूसते हैं तथा कीट के अधिक प्रकोप होने पर पतितयां सूख कर गिर जाती हैं।

रोकथाम
रोकथाम के लिये निम्न में से कोई एक कीटनाशी रसायन का छिड़काव करना चाहिए

  • डाइमेथोएट 30 ई.सी. 1.25 ली./हे0
  • क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.25 ली./हे0
  • मिथाइल-ओ- डिमेटान 25 ई.सी. 1 ली./हे.

रोग

1. फाइलोडी- यह रोग माइक्रो प्लाजमा द्वारा होता है। इस रोग में पौधों का पुष्पविन्यास पत्तियों के विकृत रूप में बदलकर गुच्छेदार हो जाता है। इस रोग का वाहक कीट फुदका है।

उपचार

  • तिल की बुवाई समय से पहले न की जाये।
  • बुआई के समय कूड़ में फोरेट 10 जी. 15 किग्रा0/हे0 की दर से प्रयोग किया जाये।
  • मिथाइल-ओ-डिमेटान 25 ई.सी. 1 ली./हे. की दर से छिड़काव करना चाहिये।

2. फाइटोफ्थोरा झुलसा
इस रोग में पौधों के कोमल भाग व पत्तियां झुलस जाती हैं।

उपचार
इसकी रोकथाम हेतु आक्सीक्लोराइड 3.0 किग्रा. या मैंकोजेब 2.5 किग्रा. प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिये।

मुख्य बिन्दु

  • बुवाई 10-20 जुलाई तक अवश्यक करें।
  • पानी के निकास की समुचित व्यवस्था करें।
  • बुआई के 15-20 दिन बाद विरलीकरण अवश्य करें।
  • 20 किग्रा. गन्धक या 200 किग्रा0 जिप्सम का प्रयोग करें।