कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

जीरो टिल से बुवाई

खरीफ एग्रोक्लाइमेटिक जोनवार धान संकर धान बासमती एवं सुगंधित धान सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन जीरो टिल से बुवाई मक्का बाजरा ज्वार सॉवा कोदो राम दाना की खेती मूंगफली सोयाबीन तिल अंडी (अरण्ड) अरहर मूंग उर्द सहफसली खेती खरपतवार नियंत्रण लोबिया तोरिया हरा चारा बीज का महत्त्व क्रॉस एवं मोथा ऊसर सुधार कार्यक्रम सनई की खेती जैव उर्वरक महत्ता एवं उपयोग फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य पोषक तत्व प्रबंधन फसल चक्र यंत्र एवं मशीनरी खरीफ फसलों के आंकड़े (परिशिष्ट एक एवं दो ) एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम का मासिक कैलेंडर सघन पद्धतियाँ 2016 मशरूम की खेती जैविक खेती फसलों के अवशेष धान की बुवाई रक्षा रसायन प्रमुख रासायनिक उर्वरक खरीफ फसलों के आंकड़े नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान सत्यापित प्रजातियां महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

धान की सीधी बुवाई उचित नमी पर यथा सम्भव खेत की कम जुताई करके अथवा बिना जोते हुए खेतों में आवश्यकतानुसार नानसेलेक्टिभ खरपतवारनाशी का प्रयोग कर जीरो टिल मशीन से की जाती है। इस तकनीक से रोपाई एवं लेव की जुताई की लागत में बचत होती है एवं फसल समय से तैयार हो जाती है जिससे अगली फसल की बुवाई उचित समय से करके पूरे फसल प्रणाली की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलती है। धान की बुवाई मानसून आने के पूर्व (15-20 जून) अवश्य कर लेना चाहिए, ताकि बाद में अधिक नमी या जल जमाव से पौधे प्रभावित न हो। इसके लिए सर्वप्रथम खेत में हल्का पानी देकर उचित नमी आने पर आवश्यकतानुसार हल्की जुताई या बिना जोते जीरो टिल मशीन से बुवाई करनी चाहिए। जुताई यथासंभव हल्की एवं डिस्क है रो से करनी चाहिए या नानसेलेक्टिव खरपवतवारनाशी (ग्लाईफोसेट / पैराक्वाट) प्रयोग करके खरपतवारों को नियन्त्रित करना चाहिए। खरपतवारनाशी प्रयोग के तीसरे दिन बाद पर्याप्त नमी होने पर बुवाई करनी चाहिए। जहां वर्षा से, या पहले ही खेत में पर्याप्त नमी मौजूद हो, वहां आवश्यकतानुसार खरपतवार नियंत्रण हेतु हल्की जुताई या प्रीप्लान्ट नानेसेलेक्टिभ खरपवनारनाशी (ग्लाइसेल या ग्रेमेकसोन 2.0-2.5 ली. प्रति हे. छिड़काव करके 2-3 दिन बाद मशीन से बुवाई कर देनी चाहिए।) बोते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान देना चाहिए–

  • धान की बुवाई करने से पहले जीरो टिल मशीन का संशोधन कर लेना चाहिए, जिससे बीज (20-25 किग्रा. प्रति हे.) एवं उर्वरक निर्धारित मात्रा (120 किग्रा. डी.ए.पी.) एवं गहराई (3-4 सेमी.) में ही पड़े। ज्यादा गहरा होने पर अंकुरण तथा कल्लों की संख्या कम होगी इससे धान की पैदावार में कमी आ जाएगी।
  • बुवाई के समय, ड्रिल की नली पर विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इसके रूकने पर बुवाई ठीक प्रकार नहीं हो पाती, जिससे कम पौधे उगेंगे और उपज कम हो जायेगी। यूरिया और म्यूरेट आफ पोटाश उर्वरकों का प्रयोग मशीन के खाद बक्से में नहीं रखना चाहिए। इन उर्वरकों का प्रयोग टाप ड्रेसिेंग के रूप में धान पौधों के स्थापित होने के बाद सिंचाई उपरान्त करना चाहिए।
  • बुवाई करते समय पाटा लगाने की आवश्यकता नहीं होती अतः मशीन के पीछे पाटा नहीं बांधना चाहिए। सीधी बुवाई जीरो टिलेज धान की खरपतवार एक समस्या के रूप में आते है क्योंकि लेव न होने से इनका अंकुरण सामान्य की अपेक्षा ज्यादा होता है। बुवाई के पश्चात 48 घंटे के अन्दर पेन्डीमीथिलिन (स्टाम्प) की एक लीटर प्रति⁄हे. सक्रिय तत्व की दर से 600 से 800 लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी रहनी चाहिये तथा यह समान रूप से सारे खेत में करना चाहिये। ये दवाएं खरपतवारों के जमने के पूर्व ही उन्हें मार देती है। बाद में यदि चौड़ी पत्ती के घास आये तो उन्हें 2, 4–डी 80% सोडियम साल्ट 625 ग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए। खड़ी फसल में बाद में उगने वाले खरपतवार निराई करके निकाल देना चाहिए वैसे निचले धनखर खेतों में जल भराव के कारण खरपतवार कम आते है।

लाभ

  • धान की नर्सरी उगाने में होने वाला खर्च बच जाता है। इस विधि में जीरो टिल मशीन द्वारा 20-25 किग्रा. बीज प्रति⁄हे. बुवाई के लिए पर्याप्त होता है।
  • खेत को जल भराव कर लेव के लिए भारी वर्षा या सिंचाई जल की जरूरत नहीं पड़ती है। नम खेत में बुवाई हो जाती है।
  • धान की लेव और रोपनी का खर्च बच जाता है।
  • समय से धान की खेती शुरू हो जाती है और समय से खेत खाली होने से रबी फसल की बुवाई सामयिक हो जाती है जिससे उपज अिधक मिलती है।
  • लेव करने से खराब हुई भूमि की भौतिक दशा के कारण रबी फसल की उपज घटने की परिस्थिति नहीं आती है। रबी फसल की उपज अधिक मिलती है।

सावधानियां
धान की जीरो टिलेज से बुवाई करते समय निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिएः

  • बुवाई के पहले ग्लाइफोसेट की उचित मात्रा को खेत में एक समान छिड़कना चाहिए।
  • ग्लाइफोसेट के छिड़काव के दो दिनों के अंदर बरसात होने पर, या नहर का पानी आ जाने पर दवा का प्रभाव कम हो जाता है।
  • खेत समतल तथा जल निकासयुक्त होना चाहिए अन्यथा धान की बुवाई के तीन दिनों के अंदर जल जमाव होने पर अंकुरण बुरी तरह प्रभावित होता है।

धान की सीधी बुवाई की दशा में खरपतवार नियंत्रण
धान की जीरो टिलेज से बुवाई करते समय निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिएः

1) विसपाइरी बैक सोडियम 10% एस.सी. 200 मिली./हे. बुवाई के 20-25 दिन बाद
2) साइ हेलोफाप ब्यूटाइल-10 ई.सी. 90 ग्राम सक्रिय तत्व/हे बुवाई के 20-25 दिन
+2, 4D सोडियम साल्ट 500 ग्राम सक्रिय तत्व/हे. बाद

"डबल रोपाई" या सन्डा "प्लान्टिगं रोपाई"

पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं पश्चिमी बिहार के एग्रो क्लाइमेटिक जोन में धान की फसल को जुलाई के प्रारम्भ से अक्टूबर के मध्य तक लगभग 100 दिनों तक अत्यधिक नम अवस्था का सामना करना पड़ता है। इन क्षेत्रों में धान की खेती उपरहान (अपलैन्ड) या निचले खेतों (लो लैन्ड) में की जाती है। उपरहार खेतों में 'मानसून आने के बाद लम्बे ब्रेक की स्थिति में धान की स्थिति में धान की फसल को जल की कमी का सामना करना पड़ता है, वहीं दुसरी तरफ निचले खेतों में बहुत अधिक वर्षा हो जाने पर खेतों में आवश्यकता से अधिक पानी, जल निकास समुचित न होने से इकट्ठा हो जाता है जिससे रोपाई में विलम्ब हो जाता है। इन दोनों ही स्थितियों में धान के पौधों में कम कल्ले निकलते है, बढ़वार अच्छी नहीं होती है जिससे धान की पैदावार अन्त में बहुत कम हो जाती है। अतः मौसम के बदलते परिवेश में ग्लोबल वार्मिग एवं जल की कमी को देखते हुये प्रगतिशीन किसान "डवल ट्रान्सप्लाटिंग" या "सन्डा रोपाई" को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस पद्यति में "क्लोनल कल्ले" जो कि पूर्व रोपे गये पौधे (मदर प्लांट) से कल्लों को अलग करके प्राप्त किया जाता है की रोपाई दुबारा की जाती है। इस तरह रोपे गये धान के पौधों में जल की अधिकता एवं कमी दोनों ही स्थितियों की विपरीत स्थितियों एवं अधिक तापक्रम को भी सहने की क्षमता बढ़ जाती है परन्तु किसान भाई समुचित ढंग से "डवल ट्रान्सप्लान्टिंग" नहीं कर रहे हैं। अतः किसान भाइयों को का०हि०वि०वि० पर किये गये शोध परीक्षण के आधार पर यह संस्तुति किया जाता है कि पहली रोपाई 3 सप्ताह की अवधि के पौधे (सीडलिंग) की सामान्य दूरी (लाइन से लाइन 20 से.मी., पौधे से पौधे की 10 से.मी.) पर करें एवं दुसरी रोपाई पुनः पहले रोपे गये धान के 3 सप्ताह बाद करें। दुसरी रोपाई घनी क्लोजर स्पेसिंग पर (लाईन से लार्इन 10 से.मी. पौधे की 10 से.मी.) करनी चाहिये। इससे अधिक अवधि के पौधे/कल्ले की रोपाई करने से उपज में गिरावट आ जाती है।