कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

सॉवा

खरीफ एग्रोक्लाइमेटिक जोनवार धान संकर धान बासमती एवं सुगंधित धान सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन जीरो टिल से बुवाई मक्का बाजरा ज्वार सॉवा कोदो राम दाना की खेती मूंगफली सोयाबीन तिल अंडी (अरण्ड) अरहर मूंग उर्द सहफसली खेती खरपतवार नियंत्रण लोबिया तोरिया हरा चारा बीज का महत्त्व क्रॉस एवं मोथा ऊसर सुधार कार्यक्रम सनई की खेती जैव उर्वरक महत्ता एवं उपयोग फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य पोषक तत्व प्रबंधन फसल चक्र यंत्र एवं मशीनरी खरीफ फसलों के आंकड़े (परिशिष्ट एक एवं दो ) एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम का मासिक कैलेंडर सघन पद्धतियाँ 2016 मशरूम की खेती जैविक खेती फसलों के अवशेष धान की बुवाई रक्षा रसायन प्रमुख रासायनिक उर्वरक खरीफ फसलों के आंकड़े नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान सत्यापित प्रजातियां महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

असिंचित क्षेत्रों में बोयी जाने वाली मोटे अनाजों में साँवा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत की एक प्रचीन फसल है। यह सामान्यतया असिंचित क्षेत्र में बोयी जाने वाली सूखा प्रतिरोधी फसल है। इसमें पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से कम है। हल्की नम व ऊष्ण जलवायु इसके लिए सर्वोत्तम है।

सामान्यतया साँवा का उपयोग चावल की तरह किया जाता है। उत्तर भारत में साँवा की “खीर” बड़े चाव से खायी जाती है। पशुओं के लिए इसका बहुत उपयोग है। इसका हरा चारा पशुओं को बहुत पसन्द है। इसमें चावल की तुलना में अधिक पोषण तत्व पाये जाते हैं और इसमें पायी जाने वाली प्रोटीन की पाचन योग्यता सबसे अधिक (40 प्रतिशत तक) है।

पोषक तत्व की मात्रा (प्रत्येक 100 ग्राम में)

फसल प्रोटीन (ग्राम) काबोहाइड्रेट (ग्राम) वसा (ग्राम) कूड फाइवर (ग्राम) लौह तत्व कैल्शियम (मिग्रा.) फास्फोरस (मिग्रा.)
चावल 6.8 78.2 0.5 0.2 0.6 10.0 60.0
साँवा 11.6 74.3 5.8 14.7 4.7 14.0 121.0

मिट्टी
सामान्यता यह फसल कम उपजाऊ वाली मिट्टी में बोयी जाती है। इसे आंशिक रूप से जलाक्रांत मिट्टी जैसे नदी के किनारे की निचली भूमि में भी उगाया जा सकता है। परन्तु इसके लिए बलुई दोमट व दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोष्ण तत्व हो, सर्वाधिक उपयुक्त है।

खेती की तैयारी
मानसून के प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा दो – तीन जुताईयां हल से करके खेत को भली – भॉति तैयार कर लेना अधिक पैदावार के लिए उपयुक्त होता है।

जुताई का समय
साँवा की बुवाई की उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही इसकी बुवाई कर देनी चाहिए। इसके बुवाई छिटकावाँ विधि से या कूड़ों में 3-4 सेमी. की गहराई में की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसकी रोपाई करते हैं। परन्तु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी. रखते है लाइन में बुवाई लाभप्रद होती है। पानी के लगाव वाले स्थान पर मानसून के प्रारम्भ होते ही छिटकवाँ विधि से बुवाई कर देना चाहिए तथा बाढ़ आने के सम्भवना से पूर्व फसल काट लेना श्रेयस्कर होता है।

बीज दर
प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किग्रा. गुणवत्तायुक्त बीज पर्याप्त होता है।

प्रजातियॉ

प्रजाति पकने की अवधि (दिवस में) पौधे की लम्बाई (सेमी.) बाली की लम्बाई (सेमी.) पौधों का रंग उपज (कु.⁄हे.) क्षेत्र
टी.-46 - - - - 10-12 उ.प्र. में विशेष रूप से प्रचलित
आई.पी.-149 80-90 145 26-26- हल्का भूरा रंग 12-13
यू.पी.टी-18 74-80 126-130 हल्का भूरा रंग 12 -
1 2 3 4 5 6 7
आई.पी.एम.-97 83-8 140-150 12-14 हल्का भूरा रंग 10
आई.पी.एम.-100 65-67 130-140 - हल्का भूरा रंग 10-12
आई.पी.एम.-148 77-86 150-162 - हल्का भूरा रंग 11-12
आई.पी.एम.-151 80-88 135-162 14-17 हल्का भूरा रंग 12-13
मदिरा-21, मदिरा -29 व चन्दन अन्य नई उन्नतशील प्रजाति है। प्रदेश में शुद्ध अथवा कपास, अरहर व अन्य अल्प अवधि के दलहनी फसलों के साथ मिश्रण के रूप में बोयी जाती है।

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग
जैविक खाद का उपयोग हमेशा लाभकारी होता है क्योंकि मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के साथ-साथ जल धारण क्षमता को भी बढ़ाता है। 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मानसून के बाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है। नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा 40:20:20: किग्रा. प्रति हेक्टेयर के अनुपात में प्रयोग करने से उत्पादन परिणाम बेहतर प्राप्त होता है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने की स्थिति में नत्रजन की आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में बुवाई के 25-30 दिन बाद फसल में छिड़काव करना चाहिए।

पानी का प्रबन्धन
सामन्य तथा साँवा की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु जब वर्षा लम्बे समय तक रूक गयी हो, तो पुष्प आने की स्थिति में एक सिंचाई आवश्यक हो जाती है। जल भराव की स्थिति में पानी के निकासी की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
बुवार्इ के 30 से 35 दिन तक खेत खरपतवार रहित होना चाहिए। निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही पौधों की जड़ो में आक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैलकर भोज्य पदार्थ एकत्र कर पौधों की देती हैं। सामान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिवस के अन्तराल पर पर्याप्त है। पंक्तियों में बाये गये पौधों की निराई-गुड़ाई हैण्ड हो अथवा हवील हो से किया जा सकता है।