कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

जैविक खेती

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अपनी खेती, अपनी खाद। अपना बीज, अपना स्वाद।

प्रस्तावना
जैविक खेती कृषि की वह पद्धति है, जिसमें पर्यावरण को स्वच्छ प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल एवं वायु को प्रदूषित किये बिना दीर्घकालीन व स्थिर उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का उपयोग कम से कम व आवश्यकतानुसार किया जाता है। यह पद्धति रसायनिक कृषि की अपेक्षा सस्ती, स्वावलम्बी एवं स्थाई है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। भूमि का आहार जीवांश हैं। जीवाशं गोबर, पौधों व जीवों के अवशेष आदि को खाद के रूप में भूमि को प्राप्त होते हैं। जीवांश खादों के प्रयोग से पौधों के समस्त पोषक तत्व प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही इनके प्रयोग से उगाई गयी फसलों पर बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप बहुत कम होता है जिससे हानिकारण रसायन, कीटनाशकों के छिड़काव की आवश्यकता नहीं रह जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि फसलों से प्राप्त खाद्यान, फल एवं सब्जी आदि हानिकारण रसायनों से पूर्णतः मुक्त होते हैं। जीवांश खाद के प्रयोग से उत्पादित खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट, पोषक-तत्वों से भरपूर एवं रसायनों से मुक्त होते हैं।
जैविक खेती के लिए जीवांश जैसे गोबर की खाद (नैडप विधि) वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक एवं हरी खाद का प्रयोग भूमि में किया जाना आवश्यक है।

नादेप कम्पोस्ट
कम्पोस्ट बनाने का एक नया विकसित तरीका नादेप विधि है जिसे महाराष्ट्र के कृषक नारायण राव पान्डरी पाडे (नाडेप काका) ने विकसित किया है। नादेप विधि में कम्पोस्ट खाद जमीन की सतह पर टांका बनाकर उसमें प्रक्षेत्र अवशेष तथा बराबर मात्रा में खेत की मिट्टी तथा गोबर को मिलाकर बनाया जाता है। इस विधि से 01 किलो गोबर से 30 किलो खाद चार माह में बनकर तैयार हो जाता है। नादेप कम्पोस्ट निम्न प्रक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है।

(1). टांका बनाना
नादेप कम्पोस्ट का टांका उस स्थान पर बनाया जाये जहां भूमि समतल हो तथा जल भराव की समस्या न हो। टांका के निर्माण हेतु आन्तरिक माप 10 फीट लम्बी, 6 फीट चौड़ी और 3 फिट गहरी रखनी चाहिए। इस प्रकार टांका का आयतन 180 घन फीट हो जाता है। टांका की दीवार 9 इंच चौड़ी रखनी चाहिए। दीवार को बनाने में विशेष बात यह है कि बीच बीच में यथा स्थान छेद छोड़ जायें जिससे कि टांका में वायु का आवागमन बना रहे और खाद सामग्री आसानी से पक सके। प्रत्येक दो ईटों के बाद तीसरी ईंट की जुड़ाई करते समय 7 इंच का छेद छोड़ देना चाहिए। 3 फीट ऊंची दीवार में पहले, तीसरे छठे और नवें रद्दे में छेद बनाने चाहिए। दीवार के भीतरी व बाहरी हिस्से को गाय या भैंस के गोबर से लीप दिया जाता है। फिर तैयार टांका को सूखने देना चाहिए। इस प्रकार बने टांका में नादेप खाद बनाने के लिए मुख्य रूप से 4 चीजों की आवश्यकता होती है।

पहली
व्यर्थ पदार्थ या कचरा जैसे सूखे हरे पत्ते,छिलके, डंठल, जड़ें, बारीक टहनियां व व्यर्थ खाद पदार्थ आदि।
इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इन पदार्थों के साथ प्लास्टिक/पालीथीन, पत्थर व कांच आदि शामिल न हो। इस तरह के कचरे की 1500 किलोग्राम मात्रा की आवश्यकता होती है।

दूसरी
100 किलोग्राम गाय या भैंस का गोबर या गैस संयंत्र से निकले गोबर का घोल।

तीसरी
सूखी महीन छनी हुई तालाब या नाले की 1750 किलोग्राम मिट्टी। गाय या बैल के बांधने के स्थान की मिट्टी अति उत्तम रहेगी। मिट्टी का पॉलीथीन/प्लास्टिक से रहित होना आवश्यक है।

चौथी
पानी की आवश्यकता काफी हद तक मौसम पर निर्भर करती है। बरसात में जहां कम पानी की आवश्यकता रहेगी। वहीं पर गर्मी के मौसम में अधिक पानी की आवश्यकता होगी। कुल मिलाकर करीब 1500 से 2000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। गोमूत्र या अन्य पशु मूत्र मिला देने से नादेप खाद की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी होगी।