कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

पोषक तत्व प्रबंधन

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प्रत्येक किसान यह अपेक्षा करता है कि उसकी जोत के सम्पूर्ण क्षेत्र में अच्छी गुणवत्ता वाली अधिक से अधिक उपज प्राप्त हो। प्रारम्भ में जब रासायनिक उर्वरक उपलब्ध नहीं थे खेती में जैविक खादों का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता था जिससे कृषि उत्पादन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता था परन्तु 60 के दशक में जब हरित क्रांति का उद्भव हुआ, उर्वरकों का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ता गया जिससे उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई। प्रारम्भ में प्रमुख पोषक तत्वों में केवल नत्रजनिक उर्वरकों का प्रयोग हुआ लेकिन धीरे-धीरे फास्फेटिक एवं पोटेशिक उर्वरकों के महत्व को समझते हुए इनका प्रयोग भी होने लगा परन्तु अन्य आवश्यक पोषक तत्वों यथा मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक, आयरन, कापर मैंग्नीज, मालिब्डेनम तथा बोरान एवं क्लोरीन की मिट्टी में कमी होती रही, फलस्वरूप इन तत्वों की पौधों को आवश्यकतानुसार उपलब्धता न होने से अधिकांश क्षेत्रों में उत्पादन में ठहराव आ गया तथा उत्पादन में कमी भी देखी गयी। मृदा के जीवांश में हो रहे लगातार ह्रास से मृदा में भौतिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं में इस प्रकार परिवर्तन हुआ कि देश की बढ़ती आबादी के सापेक्ष खाद्यान्नोत्पादन पर प्रश्न चिन्ह लग गया। गोबर की खाद/ हरी खाद या गेहूँ के भूसे द्वारा कुल पोषक तत्वों के 50 से 75 प्रतिशत आपूर्ति से फसल प्रणाली की उपज में वृद्धि होती है तथा उर्वरता बनी रहती है।

तत्व प्रबन्धन का मूल सिद्धान्त
मृदा उर्वरता का संतुलन इस प्रकार किया जाय कि फसल की मांग एवं आवश्यकता के अनुसार पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध होते रहें, जिससे अधिक से अधिक (वांछित) उपज मिल सके और मृदा स्वस्थ्य सुरक्षित बना रहे। इसके लिए आवश्यकतानुसार अकार्बनिक एवं कार्बनिक स्रोतो से फसल को सभी तत्वों का निश्चित अनुपात में ग्रहण करना आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक तत्व का पौधों के अन्दर अलग-अलग कार्य एवं महत्व है जो विभिन्न अवस्थाओं में पूर्ण होता है। कोई एक तत्व दूसरे तत्व का पूरक नहीं है। यह संतुलन बिगड़ने पर उत्पादन सीधे प्रभावित होता है। इस व्यवस्था/ तकनीकी को एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन की संज्ञा दी गई है।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन के घटक

  • जैविक खाद/ उर्वरक
  • फसल अवशेष
  • जीवाणु खाद
  • रसायनिक खाद।

कृषि में एकीकृत तत्व प्रबन्धन से लाभ

  • अधिकतम पैदावार प्राप्त करना।
  • पोषक तत्वों को बर्बादी से बचाना।
  • विषैलापन तथा प्रतिक्रियाओं से बचाना, किसी एक तत्व की अधिकता भी विषैलापन पैदा करती है।
  • मृदा की उत्पादकता एवं स्वास्थ्य बनाये रखना।
  • गुणात्मक उत्पादन।
  • वातावरण की विपरीत परिस्थितियों से बचाव।
  • कीड़े मकोड़ों के प्रभाव को प्राकृतिक तौर पर कम करना।
  • लाभ/लागत अनुपात में वृद्धि।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन हेतु कुछ सुझाव

  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों एवं जैविक खादों का प्रयोग करें।
  • दलहनी फसलों में राइजोबियम कल्चर का प्रयोग अवश्य करें।
  • धान व गेहूं के फसल चक्र में ढैंचे की हरी खाद का प्रयोग करें।
  • फसल चक्र में परिवर्तन करें।
  • आवश्यकतानुसार उपलब्धता के आधार पर गोबर तथा कूड़ा करकट का प्रयोग कर कम्पोस्ट बनाई जाये।
  • खेत में फसलावशिष्ट जैविक पदार्थों को मिट्टी में मिला दिया जाय।
  • विभिन्न प्रकार के जैव उर्वरकों तथा नत्रजनिक संस्लेषी, फास्फेट को घुलनशील बनाने वाले बैक्टीरियल अल्गन तथा फंगल बायोफर्टिलाइजर का प्रयोग करें।
  • कार्बनिक पदार्थ तथा अकार्बनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें।

जैविक खादों एवं जैव उर्वरकों द्वारा उर्वरकों के समतुल्य पोषक तत्व

सामग्री निवेश की मात्रा उर्वरकों के रूप में पोषक तत्वों की समतुल्य मात्रा
(क) जैविक खादें/फसल अवशेष
गोबर की खाद प्रति टन 3.6 किग्रा० नाइट्रोजन फास्फोरस (पी०2 ओ० 5)+ पोटाश (के2 ओ०) (2:1:1)
ढैंचा की हरी खाद 45 दिन की फसल 50-60 किग्रा० नाइट्रोजन (बौनी जाति के धान में)
गन्ने की खोई 5 टन प्रति हे० 12 किग्रा० नाइट्रोजन प्रति टन
धान का पुआल+जलकुम्भी 5 टन प्रति हे० 20 किग्रा० नाइट्रोजन प्रति टन
जैव उर्वरक
राइजोबियम कल्चर एजेटोबैक्टर एवं कल्चर 19-22 किग्रा० नाइट्रोजन
एजोस्पिरिलम 20 किग्रा० नाइट्रोजन
नील हरित शैवाल 10 किग्रा० प्रति हे० 20-30 किग्रा० नाइट्रोजन
एजोला 6-21 टन प्रति हे० 3-5 किग्रा० प्रति हे०