कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

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कोदो

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असिंचित क्षेत्रों में बोये जाने वाले मोटे अनाजों में कोदों का महत्वपूर्ण स्थान है। कोदों का पौधा सहिष्णु और सूखा सहने वाला होता है। उन भागों में भी, जहां पर खरीफ के मौसम में वर्षा नियमित रूप से नहीं होती, यह फसल आसानी से उगाई जा सकती है। इस फसल के लिए 40-50 सेमी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयक्त पाये गये हैं। प्रदेश में इसकी खेती जनपद सोनभद्र, ललितपुर, चित्रकूट, बहराइच, सीतापुर, खीरी व बाराबंकी में की जाती है। इसके दाने कठोर बीज आवरण से ढके रहते हैं। इसको पकने के लिए इस कठोर बीज आवरण को हटाना आवश्यक है। इसका अधपका व मोल्टेड अनाज जहरीला होता है। कोदों फसल आसानी से संरक्षित होता है और यह अकाल की स्थिति में भी पैदावार देने में सक्षम है। मधुमेह रोग में पीड़ित रोगियों के लिए कोदों, चावल के विकल्प के रूप में सिफारिश किया जाता है। इसके भूसे की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है और यह घोड़े के लिए हानिकारक होता है।

चावल की तुलना में कोदों में पाये जाने वाले पौष्टिक तत्वों का संयोजन निम्नानुसार है

फसल प्रोटीन (ग्राम) काबोहाइड्रेट (ग्राम) वसा (ग्राम) कूड फाइवर (ग्राम) लौह तत्व कैल्शियम (मिग्रा.) फास्फोरस (मिग्रा.)
चावल 6.8 78.2 0.5 0.2 0.6 10.0 160.0
कोंदों 8.3 65.9 1.4 9.0 2.6 27.0 188.0

मिट्टी
कोदों प्रायः सभी प्रकार की भूमि में उगाई जाती है। बजरीयुक्त पथरीली भूमि में भी प्रतिकूल परिस्थिति एवं खराब मिट्टी के बावजूद कोदों की फसल से अनाज व भूसा प्राप्त होता है। लेकिन यह रेतिली बलुई मिट्टी एवं अच्छी दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। पानी का निकास अच्छा होना चाहिए।

खेती की तैयारी
मानसून के प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। मानसून के प्रारम्भ होने के साथ ही मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा दो-तीन जुताईयां हल से करके खेत को भली-भॉति तैयार कर लेना चाहिए।

बुवाई

(क) समय

कोदों की बुवाई का उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। जब भी खेत में पर्याप्त नमी हो बुवाई कर देनी चाहिए। कोदों की बुवाई अधिकतर छिटकवां विधि से की जाती है, परन्तु यह वैज्ञानिक नहीं है क्योंकि इससे हर पौधे के बीच बराबर दूरी नहीं छूटती तथा बीज का अंकुरण भी एक सा नहीं होता। पंक्तियों में की गयी बुवाई अधिक लाभकारी होता है। इसमें पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 से 50 सेमी० एवं पौधे से पौधे की बीज की दूरी 8 से 10 सेमी० होना चाहिए। बीज बोने की गहराई लगभग 3 सेमी० होना चाहिए।

(ख) बीज की दर
15 किग्रा० प्रति हेक्टेयर।
नोट इसके अतिरिक्त डिंडोरी 73, पाली कोयम्बटूर 2 तथा निवास-1 अन्य उन्नत किस्में हैं।

कोदों की प्रजातियॉ

प्रजाति फसल की अवधि (दिवस में) उत्पादकता (कु०/हे०) प्रचलित क्षेत्र प्रमुख विशेषता
जे०के०-6 85-90 16-18 मध्य प्रदेश अगैती प्रजाति
जे०के०-62 100-105 18-20 मध्य प्रदेश स्थानीय जर्मप्लाज्म से चयनित
जे०के०-2 110-112 18-20 गुजरात -
ए०पी०के०-1 100-102 18-20 तमिलनाडु पी०एस०सी०-5 से के०एम०वी०-20
100-105 17-20 तमिलनाडु पाली, जाति से चयनि
(वम्बन-1) जी०पी०वी०के०-3 100-105 18-20 मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु हेड स्मट प्रतिरोधी एवं व्यापक रूप से प्रचलित

इसके अतिरिक्त डिंडोरी 73, पाली कोयम्बटूर 2 तथा निवास-1 अन्य उन्नत किस्में हैं।

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग
जैविक खाद का उपयोग हमेशा लाभकारी होता है क्योंकि यह मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के साथ-साथ पानी संरक्षण क्षमता को भी बढ़ाता है। 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मानसून के बाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है। 40:20:20 किग्रा० प्रति हेक्टेयर की दर से नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूड़ों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए। नत्रजन का शेष आधा भाग बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए।

पानी का प्रबन्धन
कोदों की खेती प्रायः खरीफ में की जाती हैं जहॉ पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी यदि पानी की सुविधा उपलब्ध हो तो एक या दो सिंचाई उस समय दी जा सकती है जब वर्षा लम्बे समय तक रूक गयी हो। अत्याधिक वर्षा की स्थिति में पानी के निकासी का प्रबन्ध अति आवश्यक हैं।

खरपतवार नियंत्रण
पौध की बढ़वार के शुरूआती स्थिति में खेत खरपतवार रहित होना चाहिए, मुख्यतया बुवाई के 30 से 35 दिवस तक। सामान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिवस के अन्तराल पर पर्याप्त है। पंक्तियों में बोये गये पौधों की निराई-गुड़ाई हैण्ड-हो अथवा हवील-हो से किया जा सकता है।

फसल सुरक्षा

बीमारी
1. अरगट

यह बीज जनित रोग है और फफूँद के कारण होती है। इस रोग का प्रकोप पौधों में फूल आने के समय होता है। इसमें फूलों से एक चिपचिपा, हल्के गुलाबी रंग का स्त्राव निकलता है जो बाद में सूखकर एक पपड़ी ना देता है। रोग ग्रसित अनाज का उपयोग मनुष्य एवं जानवर दोनों के लिए हानिकारक होता है।