कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन

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प्रदेश में कृषि के प्रति वांछित आकर्षण पैदा करने एवं उसको कम खर्चीला और अधिक लाभकारी बनाने के लिए जिन उपायो पर गौर किया जा रहा है, उनमें प्रमाणित एवं उपचारित बीजों की उपलब्धि, उर्वरकों का सही ढ़ंग से उपयोग, अच्छा जल प्रबन्ध एवं इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट मुख्य हैं। प्रदेश में हर वर्ष अनेक कीट, रोगों, चूहों एवं खरपतवारों से फसली की उपज पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन समस्याओं में धान का बाल काटने वाला सैनिक कीट, धान का गन्धी कीट, चने एवं अरहर की फली बेधक, मूंगफली का सफेद गिडार, सरसों का माहूं, आम का फुदका, आलू का पछेता झुलसा, मटर का बुकनी रोग, टमाटर एवं भिण्डी का मौजेक, अरहर का बन्झा रोग और गेहूं का मामा आदि कुछ प्रमुख समस्याऐं हैं।

अभी तक इन समस्याओं से निपटने के लिए आमतौर पर केवल रसायनों का ही सहारा लिया जाता रहा है। यह रसायन खर्चीले होने के साथ-साथ वातावरण को दूषित करते हैं एवं कई प्रकार की दुर्घटनाओं का भय भी बना रहता है। इन रसायनों के अवशेष अक्सर फूलों एवं सब्जियों आदि में रह जाते हैं तथा उपभोक्ता के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव छोड़ सकते हैं। रसायनों के निरन्तर उपयोग से कई कीटों में उनके विरूद्ध अवरोध पैदा हुआ है और बहुत से कम महत्वपूर्ण कीट बड़ी समस्यायें बने हैं। साथ ही साथ खेत में या वातावरण में उपस्थित परजीवी कीट समाप्त हो जाते हैं और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है। समस्याओं के प्रभावी निदान एवं उपर्युक्त खतरों से बचने लिए अब जिस पद्धति पर जोर दिया जा रहा है उसको इंटीग्रटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट या एकीकृत नाशीजीव प्रबन्ध कहा जाता है। इस पद्धति में कीटों रोगों और खरपतवारों आदि के उन्मूलन या नियन्त्रण के बजाय उनके प्रबन्ध की बात की जाती है। वास्तव में हमारा ध्येय किसी जीव को हमेशा के लिए नष्ट करना नहीं है बल्कि ऐसे उपाय करने से है जिससे उनकी संख्या/घनत्व सीमित रहे और उनसे आर्थिक क्षति न पहुंच सके। इस पद्धति की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं।

  • गर्मी में गहरी जुताई करके फसलों एवं खरपतवारों के अवशेष को नष्ट कर देना जिससे कीट/रोग के अवशेष उन्हीं के साथ नष्ट हो जायें और उनकी वृद्धि पर नियन्त्रण पाया जा सके।
  • समुचित फसल चक्र अपनाया जाना।
  • फसल के प्रतिरोधी प्रजातियों के मानक बीजों की बुवाई करना।
  • हमेशा बीज को शोधित करके बोना।
  • बुवाई समय से व एकसार की जाय, पौधों से पौधों की वांछित दूरी बनाये रखी जाये।
  • उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया जाय।
  • समुचित जल प्रबन्ध अपनाया जाय।
  • निराई-गुड़ाई करके समय से खरपतवारों को नष्ट करते रहें।
  • सर्वेक्षण द्वारा नाशीजीव एवं उनके प्राकृतिक शत्रुओं पर बराबर निगाह रखी जाय और यदि नाशीजीव प्राकृतिक शत्रु से बराबर अधिक मात्रा में हों तभी रासायनिक उपचार अपनाया जाय।
  • नाशीजीव के अण्ड समूह एंव इल्लियों को प्रारम्भिक अवस्था में नष्ट करते रहें।
  • प्रकाश/फेरोमैन ट्रैप का उपयोग करके नाशीजीव के प्रौढ़ को नष्ट किया जाय।
  • नाशीजीव के प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करने के लिए उन्हें बाहर से लाकर खेतों में छोड़ा जाय।

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट में पहली आवश्यकता यह है कि फसलों का बराबर सर्वेक्षण किया जाता रहे, ताकि किसानों एवं कार्यकर्ताओं को विभिन्न कीटों और रोगों आदि की स्थिति के बारे में ज्ञान होता रहे। यह भी आवश्यक है कि कार्यकर्ताओं और किसानों के प्रशिक्षण का उचित प्रबन्ध किया जाये, ताकि वह समस्याओं को पहचानने और उससे सम्बन्धित उस बिन्दु अथवा अवस्था को जानने की क्षमता ला सकें, जिन पर रसायनों का प्रयोग या दूसरे कार्य करने आवश्यक हो जाते हैं।

इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट में जैविक रसायनों का बहुत महत्व है जिसमें विभिन्न् प्रकार के परजीवी/परभक्षी कीट, फफूंदी, बैक्टीरिया, विषाणु और अन्य जीव जन्तु हैं, जिनके द्वारा फसलों के हानिकारक कीटों एवं रोगों आदि का निदान किया जाता है। सामान्य पर्यावरण में यह सारे जीव अपना कार्य करते रहते हैं और समस्याओं को काफी हद तक सीमा में रखते हैं परन्तु आज की सघन खेती में इनकी सामान्य कार्यशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसमें रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग सबसे बड़ी बाधा है। प्रदेश में कई कीट एवं अन्य समस्याओं का प्रभारी जैविक निन्त्रण किया गया है जिसमें गन्ने का पाइरिला कीट, चने का फली बेधक एवं जलकुम्भी का नियन्त्रण किया गया है जिसमें गन्ने का पाइरिला कीट, चने का फली बेधक एवं जलकुम्भी का सफल नियन्त्रण कुछ विशेष उदाहरण हैं। चने के फली बेधक के लिए न्यूक्लियर पाली हेड्रोसिस वाइरस (एन०पी०वी०) 250 शिशु समतुल्य की दर से बहुत सफल पाया गया है। जलकुम्भी जो प्रदेश के जलाशयों की बड़ी समस्या है, दो प्रजातियों के कीटों (वीविल) द्वारा प्रभावी ढंग से नियंत्रण में आ सकती है। जैविक नियन्त्रण को बढ़ाने के लिए ऐसी प्रयोगशालाओं की स्थापना की आवश्यकता है, जहां पर जीवियां आदि को पालकर बढ़ाया जा सके और उनका सफल परीक्षण किया जा सके। डायपेल-8 एल नामक विषाणु युक्त जैविक रसायन का उपयोग लैपीडाप्टेरस कीट के नियन्त्रण के लिए किया जा रहा है।

अनेक प्रमुख फसलों के मुख्य कीट समस्याओं का उप संख्या/घनत्व का ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जिन पर रसायनों का प्रयोग किया जाता है, इसमें धान के सभी कीट, सरसों का माहूं और कपास के कीट शामिल हैं। अन्य कीटों और रोगों के लिए इस प्रकार के अध्ययन की आवश्यकता है, ताकि उनके बारे में भी इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो सके। प्रदेश के विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थानों में इन विषयों पर शोध कार्य चल रहा है जैसे जैसे ज्ञान मिलता जायेगा, वैसे वैसे इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट की पद्धति को प्रभावी ढंग से अपनाने में सफलता मिलेगी इंटीगेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट की पद्धति को अपनाने से कृषि रखा रसायनों पर खर्च कम आयेगा, किसान को राहत मिलेगी और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।