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उत्तर प्रदेश

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ऊसर सुधार कार्यक्रम

खरीफ एग्रोक्लाइमेटिक जोनवार धान संकर धान बासमती एवं सुगंधित धान सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसीफिकेशन जीरो टिल से बुवाई मक्का बाजरा ज्वार सॉवा कोदो राम दाना की खेती मूंगफली सोयाबीन तिल अंडी (अरण्ड) अरहर मूंग उर्द सहफसली खेती खरपतवार नियंत्रण लोबिया तोरिया हरा चारा बीज का महत्त्व क्रॉस एवं मोथा ऊसर सुधार कार्यक्रम सनई की खेती जैव उर्वरक महत्ता एवं उपयोग फसल सुरक्षा रसायनों का नाम व मूल्य पोषक तत्व प्रबंधन फसल चक्र यंत्र एवं मशीनरी खरीफ फसलों के आंकड़े (परिशिष्ट एक एवं दो ) एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम का मासिक कैलेंडर सघन पद्धतियाँ 2016 मशरूम की खेती जैविक खेती फसलों के अवशेष धान की बुवाई रक्षा रसायन प्रमुख रासायनिक उर्वरक खरीफ फसलों के आंकड़े नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान सत्यापित प्रजातियां महत्वपूर्ण दूरभाष नम्बर

ऊसर सुधार कार्यक्रम

ऊसर सुधार का कार्यक्रम मई के अंतिम अथवा जून के प्रथम सप्ताह से प्रारम्भ करना चाहिए। सर्वप्रथम खेत की जुताई करके उसकी मेड़बन्दी कर लें। इसके उपरान्त जिप्सम की आवश्यक मात्रा को खेत में समान रूप से बिखेर कर लगभग 10 सेमी० गहराई तक मिट्टी में मिला दें। जिप्सम मिलाने के तुरन्त बाद खेत में पानी भर दें जो लगभग दो सप्ताह तक भरा रहना चाहिए। ध्यान रहे कि खेत में लगभग 10-15 सेमी० ऊंचाई में पानी अवश्य भरा रहे। ऐसा करने से यह ऊसर भूमि को घुलनशील लवण तथा सोडियम निचली सतहों में निक्षालित हो जाते हैं। जिसे मृदा अम्ल अनुपात एवं पी०एच० कम हो जाता है।

ऊसर भूमि को सुधारने के लिए संस्तुत जिप्सम की आधी मात्रा तथा 10 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद अथवा 10 टन प्रेसमड (सल्फीटेशन प्लान्ट) अथवा 10 टन फ्लाईऐस प्रति हेक्टेयर की दर से उपलब्ध होने की दशा में करें। यदि गोबर की खाद, प्रेसमड तथा फ्लाईऐस उपलब्ध न हो तो जिप्सम की संस्तुति की गई आधी मात्रा का प्रयोग करें। मृदा सुधारकों के प्रयोग के बाद रिक्लेमेशन को प्रक्रिया पूरी होने पर खरीफ में प्रथम फसल के रूप में धान की फसल लें।

खरीफ की फसल क्षारीयता की अपेक्षा लवणता से अधिक प्रभावित होती है, जबकि रवी की फसलें लवणता की अपेक्षा क्षारीयता से अधिक प्रभावित होती है। धान क्षारीयता को सह लेता है, परन्तु लवणता के प्रति उतना सहनशील नहीं है। ऊसरीली भूमि में 2-3 वर्षों तक खरीफ में धान की अनवरत फसल ली जानी चाहिए, क्योकिं जैविक क्रिया के फलस्वरूप एक प्रकार का कार्बनिक अम्ल उत्पन्न होता है जो क्षारीयता को कम करता है साथ ही भूमि में सोडियम तत्व का अवशोषण अधिक मात्रा में होने से भूमि में विनिमयशील सोडियम की मात्रा कम हो जाती है और भूमि की भौतिक तथा रासायनिक गुणवत्ता में शनैः शनैः सुधार हो जाता है।

धान के बाद रवी में पहली फसल गेहूँ की ली जानी चाहिए। यदि भूमि लवणीय हो तो जौ की फसल उपयुक्त होगी। गेहूँ के बाद जायद में हरी खाद हेतु ढैंचा अवश्य बोना चाहिए। ताकि भूमि में जैविक कार्बन की उपलब्धता उच्च स्तर की हो जाये इस प्रकार सुधार के प्रथम वर्ष में धान गेहूँ ढैंचा का फसल चक्र अपनाना उपयुक्त होता है। सुधार के द्वितीय वर्ष से धान के बाद रबी में सरसों तथा गन्ने की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में सोडिक जमीनों में कृषि प्रारम्भ करने हेतु की जाने वाली संस्तुतियाँ:

1. दक्षिण पश्चिम अर्द्ध शुष्क मैदानी क्षेत्र हेतु
ऊसर जमीन के प्रारम्भिक वर्षों हेतु

धान-सरसों-हरी खाद फसल-चक्र के क्रम में धान-गेंहूँ-हरी खाद फसल-चक्र

2. पूर्वी मैदान क्षेत्र हेतु धान-सरसों-हरी खाद फसल-चक्र के क्रम में धान-गेंहूँ-हरी खाद फसल-चक्र

3. मध्य मैदानी क्षेत्रों की ऊसर भूमि सुधार के प्रारम्भिक वर्षों हेतु

  • धान-सरसों-हरी खाद फसल-चक्र के क्रम में धान-बरसीम-सूरजमुखी फसल-चक्र।
  • अर्ध सुधारित ऊसरीली जमीनों (आंशिक सुधारी गयी) हेतु धान-गोभी-सूरजमुखी फसल-चक्र के क्रम में धान-आलू-मूंग फसल-चक्र।

ऊसर सुधार की सस्ती तकनीकी विकसित करने की दृष्टि से उत्तर प्रदेश की विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में निम्नलिखित सुधारकों का मिश्रण संस्तुत किया जाता है।

1. दक्षिण पश्चिमी अर्द्ध शुष्क मैदानी क्षेत्र हेतु
जिप्सम दर 50% की जी०आर० के अथवा जिप्सम दर 25% जी०आर०+एफ०वाई०एम० 10 टन/हे०।

2. उत्तरी मैदानी क्षेत्र तथा मध्य मैदानी क्षेत्र हेतु जिप्सम दर 25% जी०आर०+एफ०वाई०एम० 10 टन/हे०।

ऊसरीली भूमि में धान की खेती में बरती जाने वाली सावधानियाँ
1. उपयुक्त प्रजाति का चयन करें

क्षारीय भूमि के लिए धान की संस्तुत झोना-349, साकेत-4, ऊसर धान-1, नरेन्द्र ऊसर धान-2, नरेन्द्र ऊसर धान-3, नरेन्द्र ऊसर धान-13, नरेन्द्र ऊसर धान-2008, सी०एस०आर०-10 और जया किस्में उपयुक्त हैं। सरजू-52, आई०आर-8 और जया की भी खेती लवणीय भूमि में की जा सकती है।

2. नर्सरी अच्छी भूमि में उगाई जाय
धान की नर्सरी को सामान्य अच्छी भूमि में संस्तुत सघन पद्धति के अनुसार उगाना चाहिए क्योंकि नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि में शुरू के 2-3 वर्षों में धान की पौध अच्छी नहीं होती है।

3. समय से रोपाई
रोपाई समय से करें अर्थात ऊसर-1, 2 एवं सी-एस-आर-10 की रोपाई 10 जुलाई, साकेत-4 की रोपाई 30 जुलाई तक अवश्य सम्पन्न कर ली जाय।

4. रोपाई की विधि तथा प्रति इकाई पौधों की संख्या सुनिश्चित करें
क्षारीय भूमि बहुत कड़ी होती है। रोपाई के समय यदि भूमि कड़ी है तो खेत में पानी भरकर देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके बगैर पाटा लगाये रोपाई करना चाहिए। ऐसा करने से रोपाई करते समय अंगुलियां आसानी से भूमि में धंस जाती है अन्यथा कठिनाई होती है। रोपाई 15×10 सेमी० पर करें और एक स्थान पर 3,4 पौध लगायें। रोपाई लाइनों में न करने की दशा में यह ध्यान में रखना चाहिए कि प्रति वर्ग मीटर 55-60 हिल हों। रोपाई हेतु 30 से 35 दिन की परिपक्व पौध उपयुक्त रहती है।

5. समय से गैप फिलिंग करें
रोपाई के बाद खेत में जहां क्षारीयता और लवणता की बाहुल्यता के कारण अथवा अन्य कारणों से पौधे मर जायें तो उसकी जगह उसी आयु के पौधों से गैप फिलिंग कर देना चाहिए। इसके लिए रोपाई के बाद शेष बची कुछ पौध को उसी खेत के किनारे गाड़ देना चाहिए जिससे उसका प्रयोग बाद में गैप फिलिंग में किया जा सके।

6. उर्वरकों का संतुलित तथा पौधों की वांछित अवस्था में प्रयोग
ऊसरीले क्षेत्र में नत्रजन की मात्रा को सामान्य से 15 से 25 प्रतिशत बढ़ा लेना चाहिए और उसका प्रयोग पौधे की वांछित अवस्था में करना चाहिए। पोटाश उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर रोपाई के पूर्व खेत में करना चाहिए। ऊसरीली भूमि में सुधार के पहले 2-3 वर्षों में फास्फोरिक उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती किन्तु यदि मृदा परीक्षण के परिणाम से यह पता चले कि भूमि में इस तत्व की कमी है तो उसका भी प्रयोग करना चाहिए।

7. जिंक का प्रयोग तथा खैरा रोग की रोकथाम करें
ऊसरीली भूमि में जिंक की कमी होती है जिसके कारण धान में खैरा रोग लग जाता है तथा उपज में भारी कमी हो जाती है। अतः नयी तोड़ी गयी ऊसरीली भूमि में रोपाई के समय 25 किग्रा० जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर की दर से अनिवार्य रूप से प्रयोग करना चाहिए।
कभी-कभी 25 किग्रा० जिंक सल्फेट प्रयोग करने के बाद भी खैरा रोग खेत में लग जाता है, इसकी रोकथाम के लिए 5 किग्रा० जिंक सल्फेट तथा 20 किग्रा० यूरिया 1000 लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 पर्णीय छिड़काव करना चाहिए।

8. समय से काई की रोकथाम करें
नयी तोड़ी गयी ऊसरीली भूमि में विशेषतया रेशेदार हरी नीली काई की विशेष समस्या रहती है जो एक मोटे परत के रूप में खेत में फैलकर पौधों को ढंक लेती है, जिससे पौधों की बाढ़ रूक जाती है और वह पीले पड़ने लगते हैं। इस हरी नीली काई को हाथ द्वारा पानी से छानकर बाहर निकाल लेना चाहिए अथवा काई पर 0.2-0.3 प्रतिशत कापर सल्फेट के घोल का छिड़काव खुले मौसम में जब धूप निकली हो तो करना चाहिए। ऐसा करने से काई दो तीन दिन में समाप्त हो जाती है किन्तु कुछ समय बाद पुनः उग जाती है। अतः खेत में काई दिखाई देने पर पुनः कापर सल्फेट से उपचारित करना चाहिए। यदि छिड़काव की मशीन न हो तो खेत में तूतिया (कापर सल्फेट) की आवश्यक मात्रा को पानी में घोलकर मिला देना चाहिए।

9. ऊसरीली पैच को पुन
उपचारित करें:
ऊसरीली भूमि में रोपाई और गैप फिलिंग के बाद भी बहुधा जहां ऊसरीलापन अधिक होता है, और पौधे मर जाते हैं ऊसरीली पैच दिखाई देने लगते हैं, ऐसे पैच या टुकड़ों को चारों ओर मेड़ बनाकर चिहिन्त कर लेना चाहिए, फिर उसमें 4 किग्रा० जिप्सम प्रति वर्ग मीटर की दर से मिट्टी की ऊपरी 10 सेमी० की सतह में मिला देना चाहिए। इसे बाद इस पैच में 25-30 सेमी० मोटी धान की पुआल की तह बिछा देना चाहिए। यदि कच्चा गोबर उपलब्ध हो तो उसे भी डालकर पानी भरकर 2-3 माह तक सड़ाना चाहिए। इसके बाद मार्च में पूरे खेत में ढैंचा बोकर हरी खाद बनाना चाहिए। ऐसा करने से पैच का ऊसरीलापन कम होने लगता है।

10. सिंचाई तथा जल निकास की उचित व्यवस्था करें
खेत में पानी को बहुत दिनों तक खड़ा नहीं रहने देना चाहिए अन्यथा पानी गरम होने पर उनमें बुलबुले उठने लगते है। खेत से लवणायुक्त पानी की जल निकासी नाली द्वारा बराबर निकालते रहना चाहिए और उसके स्थान पर पुनः अच्छा पानी भरते रहना चाहिए बहुधा ऊसरीले क्षेत्र में पानी के रहने के बावजूद धान के पौधे भूरे बादामी पड़कर सूखने लगते है। और ऐसा मालूम होता है कि पानी की कमी के कारण सूख रहे हैं। किन्तु ऐसी भूमि में जड़ों के पास लवणता की बाहुल्यता के कारण पौधे पीले पड़कर सूखने लगते हैं। ऐसी स्थिति में खेत में लवणयुक्त पानी को निकालकर तुरन्त ताजा पानी भर देना चाहिए और 3-4 दिन बाद उस पानी को निकालकर पुनः ताजा पानी भर देना चाहिए। ऐसा करने से भूमि में मौजूद लवण खेत से बाहर चले जायेगें और खेत धीरे-धीरे सुधर जायेंगे।

11. दींमक तथा अन्य कीट/रोग की रोकथाम करें
बहुधा ऊसरीले क्षेत्र में खेत के सूखा रहने पर दीमक का प्रकोप हो जाता है अतः उसकी रोकथाम के लिए बुवाई के पूर्व 2.5 लीटर क्लोरोपायरीफास 20% ई०सी० प्रति हेक्टेयर मिट्टी मे मिलाना चाहिए। बुवाई के बाद यदि दीमक दिखाई दे तो क्लोरोपायरीफास 20 ई०सी० 2.5-3.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी में मिलाकर देना चाहिए। अन्य कीट व्याधि से पौधों से पौधों की सुरक्षा का कार्य सामान्य फसल की भांति करना चाहिए।

12. समय से कटाई मड़ाई करे
ऊसरीले क्षेत्र में यह बात ध्यान देनें योग्य है कि धान की कटाई भूमि की तरह से 15-20 सेमी० ऊपर की जाये जिससे धान के ठूंठों के गलने के फलस्वरूप भूमि को अधिक मात्रा में जीवांश उपलब्ध हो जाये। फसल के कटने के पश्चात् बिना जुताई किये हुए तुरन्त खेत का पलेवा कर देना चाहिए। धान के ठूंठों को सड़ाने के लिए 20 किग्रा० नत्रजन प्रति हेक्टर का प्रयोग उचित नमी पर करना चाहिए। ओट जाने पर खेत की जुताई डिस्क हैरो से करके रबी के लिए खेत तैयार कर लेना चाहिए।

13. ऊसरीली भूमि में बाजरे की खेती
ऊसरीले क्षेत्र में खरीफ में धान के बाद दूसरी फसल बाजरे की है, जो लवणीयता और क्षारीयता के प्रति मध्य सहिष्णु है और भूमि के 5.8 विद्युत चालकता (ई०सी०) तक तथा 8.5 से 9.0 अम्ल अनुपात (पी०एच०) तक ली जा सकती है। ऊसरीले क्षेत्र के लिए बी०जे०-104, बी०जे०-560, पी०एच०बी०-10, पी०एच०बी०-12 उपयुक्त पायी गयी है। भूमि के अधिक लवणीय होने की दशा में इसकी बुवाई मेड़ों की ढाल के मध्य करना उचित करना होगा। ये मेड़े मैकार्मिक कल्टीवेटर में रिज और खाद व बीज के लिए दो चोंगे लगाकर बुवाई की जा सकती है। अन्य शस्य क्रियाएं सामान्य फसल की भांति अपनानी चाहिए।

14. ऊसरीली भूमि में ग्वार की खेती
मध्य लवणीय भूमि में 2-3 वर्षा हो जाने के बाद जुलाई के मध्य में ग्वार की फसल भी ली जा सकती है। यह फसल भी मध्यम सहिष्णु है।

15. ढैंचे की हरी खाद का प्रयोग किया जाना आवश्यक है।