कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

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सनई की खेती

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प्रस्तावना

सनई की खेती का भारत की कुटीर उद्योग धन्धों एवं अर्थ व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान है। कुल सनई का लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र उत्तर प्रदेश में है। प्रतागढ़, जौनपुर, आजमगढ़, सुल्तानपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर, गाजीपुर, वाराणसी, बांदा व इलाहाबाद में सनई की अच्छी खेती होती है।

जलवायु
सनई की खेती के लिए गर्म नम जलवायु उपयुक्त होती है। फसल उत्पादन समय काल में 40-45 सेमी० वर्षा अच्छी मानी जाती है।

भूमि का चयन
बलुई दोमट व दोमट सनई की फसल के लिए उपयुक्त होती है।

भूमि की तैयारी
पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। बाद में 2-3 जुताई करके मिट्टी का भुरभुरी कर लेनी चाहिए। अच्छे जमाव के लिए भुरभुरी मिट्टी तथा 35 प्रतिशत नमी आवश्यक है।

उन्नतीशील प्रजातीयां
नरेन्द्र सनई -1

बुवाई का समय
सिंचित क्षेत्रों में बुवाई का समय अप्रैल के दूसरे सप्ताह से लेकर मई के मध्य तक उपयुक्त् होता है। इस समय बुवाई करने से दो फायदे होते हैं। पहला फायदा यह हैकि जहां चारे की समस्या हो वहां इसके हरे पत्तियों को विशेषकर ऊपरी भाग को पशुओं को खिलाया जा सकता है। दूसरा लाभ यह है कि फसल रोगकीट से मुक्त रहती है। असिंचित क्षेत्र में बुवाई पही वर्षा पर कर देनी चाहिए।

बीज की मात्रा

सनई के लिए निम्न रूप से बीज दर निर्धारित है
1 हरी खाद उगाने के लिए अनुमोदित बीज मात्रा 80 किग्रा०/हे०
2 रेशे के लिए अनुमोदित बीज की मात्रा 60 किग्रा०/हे०
3 बीज उत्पादन के लिए अनुमोदित बीज की मात्रा 25-30 किग्रा०/हे०

उर्वरक की मात्रा व देने की विधि

वैसे सनई दलहनी कुल की फसल है इसके जड़ों में गाठें होती है जिसमें नाइट्रोजन फिक्सिंगवैक्टीरिया होते है इस कारण नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती परन्तु देख गया है कि फसल के प्राथमिक बढ़वार स्थाईत्व व जड़ों में ग्रन्थियों के अच्छे विकास हेतु प्रति/हे० 15-20 किग्रा० नाइट्रोजन व 60-80 किग्रा० फास्फोरस उर्वरक की प्रारम्भिक मात्रा अवश्य डालनी चाहिए यदि डी०ए०पी० उपलब्ध न हो तो सिंगल सुपर फास्फेट 125 किग्रा०/हे० की दर से प्रयोग करें।

बुवाई की विधि
क्रम सं० परिस्थित पंक्ति से पंक्ति की दूरी (सेमी० में) पौध से पौध की दूरी (सेमी०)
1 हरी खाद हेतु 20 4
2 रेशे के लिए 30 10
3 बीज उत्पादन हेतु 45 12.5

सिंचाई एवं निराई गुड़ाई
पहली सिंचाई 25 दिन पर अवश्य करे उसके बाद आवश्यकतानुसार 25-30 दिन पर 2-3 सिंचाई करते रहें इससे रेशे कर पैदावर अच्छी होती है। यदि निराई-गुड़ाई करनी हो तो पहली सिंचाई के बाद ही कर दे क्योंकि बाद में गुड़ाई अवस्था लाभप्रद नहीं होती है।

फसल की पलटाई
फसल की हरी खाद के लिए बोई गयी हो तो 45-60 दिन पर किसी भारी हल से पलट कर पानी भरे जमीन में दबायें रेशे हेतु फसल की कटाई

अप्रैल/मई में बोयी गयी फसल को 90-95 दिन के बाद तथा वर्षा ऋतु में बोई गयी फसल को 50 प्रतिशत फूल की अवस्था पर कटाई कर अच्छे व ज्यादा रेशे प्राप्त किये जा सकते है।

बीज उत्पादन हेतु फसल की कटाई
बीज हेतु फसल की कटाई लगभग 130-135 दिन पर फली से झुनझुन-2 आवाज आने पर उत्तम होती है।

फासल सुरक्षा

क्रम सं० कीट नियंत्रण
1 कोपल, तना छेदक मोनोकोटोफास 36 एस०एल० का 750 मिली लीटर दवा 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
2 फली छेदक मोनोकोटोफास दवा का 1.5 मिली लीटर पानी में घोल बनाकर 30,45 व 60 दिन की अवस्था पर छिड़काव करें।
3 सनई की सूडी थायोडीन 15 मिली० प्रति ली० पानी की दर से फसल पर छिड़काव करें।

रोग नियंत्रण

क्रम सं० कीट नियंत्रण
1 उक्ठा रोग 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किग्रा० बीज की दर से उपचार करें
2 पत्ती का मोजेक रोग बेवीस्टीन नामक दवा से 2 ग्राम प्रति किलो० ग्राम बीज को उपचारित करना चाहिए।तथा डाइथेन एम-45 दो किग्रा०/हे० एवं न्यूवाकान 1 सी०सी० प्रति ली० पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए तथा प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए।

पैदावार

सनई के रेशे वाली पैदावार निम्नवत् प्राप्त होती है-

  • अप्रैल-मर्इ में बुवाई कर (सिंचित अवस्था): 10-15 कु०/हे०
  • जून-जुलाई में बुवाई कर (असिंचित दशा): 7-8 कु०/हे०

सनई उत्पादन हेतु कुछ ध्यान देने योग्य बातें

  • सर्वदा नयी प्रजाति, एवं प्रमाणित बीज ही बोयें।
  • हरी खाद उगाते समय कम से कम 50-60 किग्रा० फास्फोरस प्रतिहेक्टर प्रारम्भिक खुराक के रूप में अवश्य प्रयोग करें। इससे पौध बढ़वार अच्छी होती है साथ में जड़ों में ज्यादा गांठे बनती है क्योंकि इन्ही गांठों में नत्रजन प्रदान करने वाले वैक्टीरिया होते है।
  • पानी लगने वाले क्षेत्र में सनई कदापि न उगाये।
  • हरी खाद का भरपूर फायदा उठाने के लिए सनई को 45-60 दिन पर जुताई कर पानी भरे जमीन में दबा देना चाहिए।
  • यदि सनई रेशे लेने के लिए उगाई गई हो तो बुवाई 15 मई के आस पास अवश्य कर दे। अधिक रेशे प्राप्त करने के लिए 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में कटाई करें।
  • बुवाई के पूर्व बीज शोधन 2 ग्राम थीरम प्रति किग्रा० बीज की दर से अवश्य कर लें।
  • अगेती बुवाई से रोग व कीट प्रकोप कम होता है। उक्ठा रोग की सम्भावना हो तो नीम की खली का प्रयोग करें। अथवा सनई+तिल+कपास की खेती मिलवा फसल के रूप में लें।
  • रोग व कीट नाशी का प्रयोग पुष्पावस्था के आस पास व फली बनते समय ही करें।
  • सनई के विभिन्न उद्देश्यों में इसके लिए निम्न रूप में बीज मात्रा पर ध्यान देना होगा।
    • हरी खाद के लिए बीज मात्रा 80 किग्रा०/हे०
    • रेशे के लिए बीज की मात्रा 60 किग्रा०/हे०
    • बीज उत्पादन के लिए बीज मात्रा 25-30 किग्रा०/हे०
  • प्रारम्भिक पौध बढवार अवस्था में नील गाय का प्रकोप ज्यादा होता है। सावधान रहें।