कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

अंडी (अरण्ड)

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अण्डी की खती तराई क्षेत्र के पीलीभीत, खीरी, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, संत कबीरनगर, गोण्डा, गारेखपुर जनपदों व बुन्देलखण्ड क्षेत्र तथा कानपुर, इलाहाबाद एवं आगरा जनपदों में शुद्ध तथा मिश्रित रूप में की जाती है। इसकी खेती मक्का और ज्वार के साथ तथा खेत की मेड़ों पर की जाती है। इसका तेल दवाओं तथा कल पुर्जो में प्रयोग होता है और विदेशी मुद्रा अर्जित करने का अच्छा साधन है।

1. उन्नतिशील प्रजातियां

क्र0 सं0 प्रजाति बोने का उपयुक्त समय (दिनों में) अवधि (कु./हे.) उपज क्षेत्र उपयुक्त
1 टा-3 सितम्बर में बोने पर 180 11-14 तराई क्षेत्र
2 तराई-4 तदैव तदैव तदैव तदैव
3 कालपी-6 जूलाई में बोने पर 240 12-14 तदैव बुन्देलखण्ड हेतु
अगस्त में बोने पर 180 तदैव
4 जी.सी. एच.4 (हाईब्रिड) जूलाई का प्रथम पखवारा 170 20-25 मैदानी क्षेत्र
5 डी.सी.एच. 177 (संकर) जूलाई का प्रथम पखवारा 170 25-30 मैदानी क्षेत्र
6 ज्वाला 48.1 जुलाई का प्रथम पखवारा, देरी (30 जुलाई तक) 180 25-30 सम्पूर्ण उ.प्र.

जलोढ़ तथा तराई क्षेत्र के लिए टा-3 एवं तराई-4 प्रजाति उपयुक्त हैं, जो जुलाई में बोकर 240-245 दिनों में एवं सितम्बर में बोने पर 180 दिन में पक कर तैयार हो जाति हैं। टा-3 का तना हरा, अधिक शाखा युक्त तथा फल चटकने वाले होते हैं। इन प्रजातियों की औसत उपज क्षमता 11 से 14 कुन्तल प्रति हेक्टर है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लिए कालपी 6 उपयुक्त है, जो जुलाई में बोकर 240 दिन में एवं अगस्त में बोकर 180 दिन में पक कर तैयार होती है। इसका तना लाल, कम शाखायुक्त और फल चटकने वाले होते हैं और इसकी औसत उपज 12 से 14 कु. प्रति हेक्टर है। संकर-जी.सी.एस.-4डी.सी.एस. 12 उन्नतिशील प्रजाति का ज्वाला की 20-30 कु./हे. मात्रा प्राप्त की जाती है।

2. बीज दर
प्रति हेक्टर 15 किग्रा. बीज का प्रयोग करना चाहिए। संकर प्रजाति 5.6 किग्रा./हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए।

3. बुवाई का समय व विधि
वर्षा होने पर बुवाई करें। बोने का उचित समय जुलाई का प्रथम पखवारा तथा अण्डी की बुवाई हल के पीछे कतारों में 90 से.मी. की दूरी पर करें। पौधे से पौधे की दूरी 90 से.मी. रखे।

4. संतुलित उर्वरकों का प्रयोग
नत्रजन 50 कि.ग्रा. एवं फास्फोरस 25 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से प्रयोग करें। राकड़ तथा भूड़ भूमि में 15 कि.ग्रा. प्रति हे. पोटाश भी डालें। फास्फोरस तथा पोटाश की कुल मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा की बुवाई के समय बेसल ड्रेसिंग करें तथा नत्रजन की शेष मात्रा की खड़ी फसल में निराई-गुड़ाई के समय टाप-ड्रेसिंग करें। संकर उन्नतिशील प्रजातियों को नत्रजन 80 किग्रा0, फास्फोरस 30 किग्रा0 एवं पोटाश 30 किग्रा0 देना चाहिए।

5. निकाई-गुडाई
बुवार्इ के तीन सप्ताह बाद पहली निकाई गुड़ाई करके पौधों की आपस की दूरी ठीक कर लें।

6. सिचाई
जहां पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां आवश्यकतानुसार सिंचाई की जा सकती है।

7. कीट एवं रोग नियन्त्रण
1. कैस्टर सेमीलूपर

पहचान
इस कीट की सूंड़ियां सलेटी काले रंग की होती हैं जो पत्ती खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी रोकथाम हेतु निम्न में से किसी एक कीटनाशी का बुरकाव या छिड़काव प्रति हेक्टर की दर से करना चहिए।

उपचार

  • क्यूनालफास 1.5 लीटर या
  • मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत 25 कि.ग्रा. या
  • डी.डी.वी.पी. 76 प्रतिशत 500 मि.लीटर।

2. पत्तियों का धब्बेदार रोग

पहचान
इस रोग में पत्तियों पर छोटे-छोटे काले या कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं तथा धब्बे के किनारे पीले रंग के होते हैं।

उपचार
इस रोग की रोकथाम हेतु 2 कि.ग्रा. जिंक मैंगनीज कार्बामेट अथवा जीरम 80 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण के 2 कि.ग्रा. अथवा जीरम 27 प्रतिशत के 3.00 लीटर का छिड़काव प्रति हे0 करना चाहिए।