कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

ऊसर सुधार

उपयुक्त फसल प्रजाति और फसल चक्र का चयन

मृदा सुधारक रसायन के प्रयोग तथा लीचिंग के बाद शुरू के 2-3 वर्षों में धान की फसल को अनिवार्य रूप से लिया जाना चाहिए। उसके पश्चात् भूमि के सुधर जाने पर बाजरा, मक्का, तिल एवं सरसों की फसल जी जा सकती है। रबी में पहले वर्ष धान के बाद गेहूं बोना उपयुक्त होगा किन्तु बाद के वर्षों में गेहूं के अतिरिक्त राई, अलसी, सरसों तथा गन्ना भी बोया जा सकता है। यदि भूमि में लवणों की मात्रा अधिक है तो जौ बोना भी उपयुक्त होगा। चुकन्दर भी सुधार के पहले वर्ष में बोया जा सकता है। जो लवणीय और क्षारीय भूमि दोनों के प्रति अपेक्षाकृत बहुत सहनशील है। ऊसरीले क्षेत्र के लिए उन्हीं प्रजातियों को चयन करना चाहिए जो ऊसर के प्रति सहनशील हों। ऊसर क्षेत्र में निम्न फसल चक्र अपनाये जा सकते हैं

प्रथम वर्ष नरेन्द्र संकर ऊसर धान-1, धान (पन्त-4 पन्त-12 सूरज-52, नरेन्द्र धान-1, सी०एस०आर-10, सी०एस०आर०-13 27 30) तथा ऊसर धान-1 ऊसर धान 2 व 3 (गेहूं) के०आर०एल० 19 ए लोक-1 तथा डब्लू एच० 157 राज-3077 (ढैंचा की हरीखाद) नरेन्द्र संकर ऊसर धान-3

  • दितीय वर्ष धान-गेहूं/ राई-ढेंचा (हरी खाद यदि पहले वर्ष में बोई गई हो)
  • तृतीय वर्ष धान-गेहूं/बरसीम/ आलू शरदकालीन गन्ना।

ढैंचा की हरी खाद तथा ऊसर पैच का उपचार

ऊसर भूमि में जीवांश की बहुत कमी होती है। अतः हरी खाद ऊसर सुधार का अभिन्न अंग हैं बगैर हरी खाद लिए हुए भूमि का पूर्ण सुधार संभव नहीं है। बहुधा मृदा सुधार रसायन के प्रयोग के बाद भी खेत में ऊसर के पैंच दिखाई पड़ते हैं जो हरी खाद के प्रयोग से कम हो जाते हैं। ऐसे ऊसर पैंच की मेड़बन्दी करके पुनः जिप्सम का प्रयोग 2 किग्रा० प्रति वर्ग मी० की दर से करना चाहिए और ऊसर क्षेत्र को चिन्हित करके उसमें 20-30 से०मी० मोटाई का धान का पुआल बिछाकर और पानी भरकर सड़ाना चाहिए। यथासंभव हरी खाद के लिए ढेंचा की (सेसवेनिया एक्यूलाटा) का प्रयोग करना चाहिए।

नत्रजनिक उर्वरक तथा जिंक का प्रयोग

ऊसरीली भूमि में नत्रजन और जिंक की भारी कमी होती है, अतः सिद्धान्त रूप से ऊसर भूमि में खेती करने पर नत्रजनिक उर्वरक की मात्रा को 15-20 प्रतिशत बढ़ा लेना चाहिए। नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि में प्रथम वर्ष में 50 किग्रा० जिंक सल्फेट का प्रयोग खरीफ में प्रति हे० करना चाहिए और बाद के वर्षों में 25-30 किग्रा० जिंक सल्फेट का प्रयोग नियमित रूप से करते रहना चाहिए। ऊसर भूमि में शुरू के 3-4 वर्षों में पोटाश उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है किन्तु फास्फेट की कमी रहती है जिसका प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर करना चाहिए।

काई की रोकथाम

नई तोड़ी गई ऊसर भूमि में शुरू के 2-3 वर्षों में रेशेदार हरी काई (एल्गी) की समस्या रहती है जो धान की रोपाई के बाद एक मोटी पर्त के रूप में फैलकर पौधों को ढ़क लेती है जिसमें पौधों की बाढ़ रूक जाती है और वे पीले पड़कर सूख जाते हैं। इस काई को हाथ द्वारा पानी से छानकर निकाला जा सकता है अथवा कोई पर 0.2-0.3 प्रतिशत कापर सल्फेट (तूतिया) के घोल का छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव कार्य खुले मौसम में जब धूप निकली हो करना चाहिए।

सघन पद्धतियों का अपनाना

सुधार के पश्चात् जो भी फसल धान गेहूं जौ राई आदि बोई जाए उसकी संस्तुत पद्धतियों को अपनाया जाए। ऊसरीले क्षेत्र की सघन पद्धतियां सामान्य क्षेत्र से भिन्न हैं। अतः उन्हें सावधानीपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

ऊसर सुधार का उपयुक्त समय

ऊसर सुधार का कार्य वर्ष भर किया जा सकता है किन्तु गर्मी के महीनों में भूमि में पानी सोखने की शक्ति सर्वाधिक होने के कारण रिसाव क्रिया में सुगमता होती है, जिससे हानिकारक लवण भूमि की निचली सतह में चले जाते हैं और ऊपरी सतह में लवणों की सान्द्रता कम हो जाती है। यदि किसी कारणवश ऊसर सुधार का कार्य गर्मी में नहीं किया गया तो उसे रबी की बुवाई के पूर्व सितम्बर-अक्टूबर में सम्पन्न करके नवम्बर के प्रथम पखवारे में गेहूं की बुवाई करना चाहिए और उसक बाद जायद में ढेंचा की हरी खाद लेकर दूसरे वर्ष खरीफ में धान की फसल लेना चाहिए।

धान की खेती में बरती जाने वाली सावधानियां

  • ऊसर के प्रति सहनशील प्रजातियों की रोपाई करें जैसे पूसा 2-21, सरजू-52, ऊसर-1, ऊसर-2, ऊसर-3, सी०एस०आर०-10, सी०एस०आर०-13।
  • प्रजातियों के अनुसार समय से रोपार्इ करें।
  • रोपाई के समय यदि भूमि कड़ी हो तो खेत में पानी भरकर देशी हल से जुताई करके बगैर पाटा लगाये रोपाई करना चाहिए।
  • रोपाई हेतु 35-40 दिन की पौध उपयुक्त है। रोपाई 15×10 से०मी० पर करें और एक स्थान पर 3-4 पौध लगायें।
  • रोपाई के एक सप्ताह बाद जो पौध अधिक ऊसरीलेपन या अन्य कारणों से मर जाये तो उनमें गैप फिलिंग करना चाहिए।
  • खैरा रोग की रोकथाम हेतु नई तोड़ी गई ऊसर भूमि में 50 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर का प्रयोग भूमि में रोपाई के पूर्व करें। जिंक को फास्फेटिक उर्वरक के साथ मिलाकर प्रयोग नहीं करें।
  • नत्रजन की मात्रा 15-20 प्रतिशत बढ़ा लें। फास्फेट उर्वरक का प्रयोग मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर करें।
  • रेशेदार हरी काई की रोकथाम हेतु उस पर 0.2-0.3 प्रतिशत कापर सल्फेट के घोल का छिड़काव करें
  • ऊसर पैच जिसमें पौध न उगे हों उन्हें फिर से जिप्सम से उपचारित करें और पुआल डालकर सड़ायें।
  • खेतों में पानी 10 दिन से अधिक खड़ा न रहने दें। लवणयुक्त पानी को बराबर निकालकर पुनः अच्छी गुणवत्ता वाला पानी भरते रहना चाहिए। अधिक गर्मी पड़ने पर पानी में जब बुलबुले उठने लगें तो उसे तुरन्त निकालकर साफ पानी भरना चाहिए।
  • अन्य शस्य क्रियायें एवं पौध सुरक्षा के उपाय सामान्य फसल की भांति अपनाये।
  • धान की कटाई भूमि की सतह से ऊंची 20-25 से०मी० पर करें ताकि धान के ठूंठों से सड़ने के बाद भूमि को अधिक मात्रा में कार्बनिक तथा जीवाशं पदार्थ सुलभ हो सके।