कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

जायद में गन्ने की खेती

बुवाई की विधियाँ

1. समतल विधि

इस विधि में 90 सेमी० के अन्तराल पर 7-10 सेमी० गहरा कॅूड डेल्टा हल से बनाकर बोया जाता है। वस्तुतः यह विधि साधारण मृदा परिस्थितियों में उन कृषकों के लिए उपयुक्त है जिनके पास सिंचाई, खाद तथा श्रम के साधन सामान्य हो। बुवाई के उपरान्त एक भारी पाटा लगाना चाहिए।

2. नाली विधि

उस विधि में बुवाई के एक या डेढ़ माह पूर्व 90 सेमी० के अंतराल पर लगभग 20-25 सेमी० गहरी नालियॉ बना ली जाती हैं, इस प्रकार तैयार की गयी नाली में गोबर की खाद डालकर सिंचाई व गुड़ाई करके मिट्टी को अच्छी प्रकार तैयार कर लिया जाता है। जमाव के उपरान्त फसल के क्रमिक बढ़वार के साथ मेड़ों की मिट्टी नाली में पौधे की जड़ पर गिराते जाते हैं, जिससे अंततः नाली के स्थान पर मेंड़ तथा मेड़ के स्थान पर नाली बन जाती है, जो सिंचाई नाली के साथ-साथ वर्षाकाल में जल निकास का कार्य भी करती है। यह विधि दोमट भूमि तथा भरपूर निवेश उपलब्धता के लिए उपयुक्त है। इस विधि से अपेक्षाकृत अधिक उपज होती है, परन्तु श्रम अधिक लगता है।

3. दोहरी पंक्ति विधि

इस विधि में 90-90 सेमी० के अन्तराल पर अच्छी प्रकार तैयार खेत में लगभग 10 सेमी गहरे कूंड बना लिये जाते हैं। यह विधि भरपूर खाद पानी की उपलब्धता में अधिक उपजाऊ भूमि के लिए उपयुक्त है। इस विधि से गन्ने की अधिक उपज प्राप्त होती है।

4. बुवाई

सामान्यतः आदर्श परिस्थियितों में तीन ऑख वाले कॅूडों में अथवा नालियों में इस प्रकार डाले जाते है कि प्रतिफुट कम से कम तीन ऑख समायोजित हो जाये। अपेक्षाकृत अच्छे जमाव के लिए दो ऑख वाले टुकड़े प्रतिफुट तीन ऑख की दर से प्रयोग किये जा सकते हैं। बुवाई के उपरान्त नाली में पेड़ी के ऊपर गामा के बी०एच०सी० 20 ई०सी० 6.25 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर हजारे से छिड़कना चाहिए अथवा फोरेट 10 जी०25 किग्रा० या सेविडाल 4.4 जी० 25 किग्रा या लिण्डेन 6 जी० 20 किग्रा०/हे० की दर से प्रयोग करना चाहिए। नालियों को फावड़े या देशी हल से तुरन्त पाट कर खेत में पाटा लगा देना चाहिए। इससे दीमक व अंकुरवेधक नियत्रित होते है।

कर्षण क्रियाएं

1. अंधी गुड़ाई

समतल विधि से बुवाई के एक सप्ताह में अथवा यदि वर्षा हो जाये या शीघ्र जमाव के लिए हल्की सिंचाई की गई हो तो अंधी गुड़ाई आवश्यक है। अंधी गुड़ाई की गहराई अधिकतम 4-5 सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए।

2. गुड़ाई

गन्ने के पौधों की जड़ों को नमी व वायु उपलब्ध कराने तथा खरपतवार नियंत्रण के दृष्टिकोण से गुड़ाई अति आवश्यक है।

मिट्टी चढ़ाना

गन्ने के थानों की जड़ पर मिट्टी चढ़ाने से जड़ों का सघन विकास होता है। इससे देर से निकले कल्लो का विकास रूक जाता है और वर्षा ऋतु से फसल गिरने से बच जाती है। मिट्टी चढ़ाने से स्वतः निर्मित नालियॉ वर्षा में जल निकास का काम भी करती है। अतः अन्तिम जून में एक बार हल्की मिट्टी चढ़ाना तथा जुलाई में अंतिम रूप से पर्याप्त मिट्टी चढ़ाकर गन्ने को गिरने से बचा कर अच्छी फसल जी जा सकती है।

बॅधाई

अधिक उर्वरक दिये जाने तथा उत्तम फसल प्रबन्धन के कारण फसल की बढ़वार अच्छी हो जाती है किन्तु जब गन्ना 2.5 मीटर से अधिक लम्बा हो जाता हैं जो वर्षाकाल में गिर जाता है। जिससे उसके रसोगुण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः गन्ने के थानों को गन्ने की सूखी पत्तियों से ही लगभग 100 सेमी० ऊॅचार्इ पर जुलार्इ के अंतिम सप्ताह में तथा दूसरी बॅधाई अगस्त में पहली बॅधाई से 50 मीटर ऊपर तथा अगस्त के अन्त में एक पंक्ति के दो थान व दूसरी पंक्ति के एक थाने से और इस क्रम को उलटते हुए त्रिकोणात्मक बॅधाई करनी चाहिए।

सिंचाई

प्रदेश के विभिन्न भागों में गन्ना फसल को 1500 से 1750 मिली० पानी की आवश्यकता होती जिसका ऑसतन 50 प्रतिशत वर्षा से प्राप्त होता है शेष पचास प्रतिशत सिंचाई से पूरा किया जाता है। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में 4-5 मध्य क्षेत्र में 5-6 तथा पश्चिमी क्षेत्र में 6-7 सिंचाई (2 सिंचाई वर्षा के उपरान्त) करना लाभप्रद पाया गया है। नमी के कमी की दशा में बुवाई के 20-30 दिन के बाद एक हल्की सिंचाई करने से अपेक्षाकृत अच्छा जमाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिनों के अंतर पर सिचाई करते रहना चाहिए।

उर्वरक

गन्ना फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों में नत्रजन का प्रभाव सर्वविदित है। पोटाश और फासोरस का प्रयोग मृदा के उपरान्त कमी पाये जाने पर ही किया जाना चाहिए। अच्छी उपज के लिए गन्ने में 150 से 180 किग्रा० नत्रजन/हे० प्रयोग करना लाभप्रद पाया गया है।

मृदा की भौतिक सुधारने, मृदा में ह्यूमस स्तर बढ़ाने व उसे संरक्षित रखने, मृदा में सूक्ष्म, जीवाणु गतिविधियों के लिए आदर्श वातावरण बनाये रखने के साथ ही निरंतर फसल लिये जाने, रिसाव व भूमि क्षरण के कारण मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हरी खाद एफ०वाई०एम० कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट सड़ी प्रेसमड आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि भूमि में सूक्ष्म तत्वों जैसे जस्ता, लोहा, मैग्नीशियम, गंधक आदि की कमी हो तो उनका प्रयोग भी संस्तुति के अनुसार किया जा सकता है।

खरपतवार नियंत्रण

एक बीज पत्री खरपतवार सेवानी, खरमकरा, दूब, मोथा, कॉस व फुलवा आदि।
दिव्बीज पत्री खरपतवार मकोय, हिरनखुरी, महकुआ, पत्थरचट्टा, बड़ी, दुद्धी, हजारदाना, कृष्णनील, तिनपतिया, जंगली जूट, बथुआ व लटजीरा आदि।