कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

कपास की खेती

कपास एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है। व्यावसायिक जगत में यह ‘श्वेत स्वर्ण’ के नाम से जानी जाती है। प्रदेश में कपास के अंतर्गत 5 लाख हे० क्षेत्रफल था जो घटकर 14 हजार हे० रह गया है। प्रदेश को लगभग 5 लाख रूई की गांठों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है। प्रदेश में व्यापक स्तर पर कपास उत्पादन की आवश्यकता है। भूमि जलस्तर में कमी, कपास मूल्य में वृद्धि बेहतर फसल-सुरक्षा उत्पादन तकनीक, कपास-गेहूँ फसल चक्र हेतु अल्प अवधि की अधिक उपज देने वाली प्रजातियों का विकास, बिनौले को तेल व खली की व्यापक उपयोग, भारत सरकार द्वारा ‘काटन टेक्नालाजिकल मिशन’ की स्थापना आदि कपास की खेती हेतु अनुकूल परिस्थितियां है। प्रदेश में कपास की औसत उपज 2 कुन्तल/हे० है। जो सभी कपास उत्पादक राज्यों से अत्यन्त कम है। अलाभकारी होने के कारण कृषक कपास की खेती के प्रति आकर्षित नहीं होते। आधुनिक निम्न फसल उत्पादन एवं फसल सुरक्षा तकनीक अपनाकर 15 कु०/हे० तक औसत उपज प्राप्त की जा सकती है तथा 15-12 ह जार रू०/हे० तक का शुद्ध लाभ कपास से प्राप्त किया जा सकता है।

फसल उत्पादन तकनीक

जलवायु की आवश्यकता
उत्तम जमाव हेतु न्यूनतम 16 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान फसल बढ़वार के समय 21 से 27 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान व उपयुक्त फलन हेतु दिन में 27 से 32 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान तथा रात्रि में ठंडक का होना आवश्यक है। गूलरों के फटने हेतु चमकीली धूप व पाला रहित ऋतु आवश्यक है।

भूमि
बलुई, क्षारीय,कंकड़युक्त व जलभराव वाली भूमियां कपास के लिए अनुपयुक्त हैं। अन्य सभी भूमियों में कपास की सफलतापूर्वक खेती की जा सकती है।

फसल चक्र

कपास गेहूं
कपास सूरजमुखी
कपास बरसीम/जई
कपास सूरजमुखी-धान-गेहूँ
कपास गन्ना- गेहूँ
कपास मटर
कपास मटर-गन्ना-गन्ना पेडी

प्रजातियाँ

प्रजाति अवधि औसत उपज(हे./हे) रेशे की लम्बाई (मिमी) ओटाई (प्रतिशत) कताई अंक
देशी
लोहित 175-180 15 17.5 38.5 6-8
आर.जी. 8 175-180 15 16.5 39.0 6-8
सी.ए.डी. 4 145-150 16 17.5 39.4 6-7
अमेरिकन
एच.एस. 6 165-170 12 24.8 33.4 30
विकास 150-165 16 25.6 34 30
एच. 777 175-180 16 22.5 33.8 30
एफ.846 175-180 14 25.4 35 30
आर.एस. 810 165-170 15 25.2 34.2 30
आर.एस. 2013 160-165 16 26 35 30

लोहित सी.ए.डी. 4 एवं विकास उत्तर प्रदेश के लिए संस्तुत प्रजातियां हैं। अन्य प्रजातियां परीक्षणों में उत्तम पाई गई हैं उनमें आर.जी.-8 आर.एस.- 810, राजस्थान की एफ.-846 पंजाब की एच.-777 व एच.एस.-6 हरियाणा की प्रजातियां हैं। इनकी खेती भी प्रदेश में की जा सकती है।