कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

जायद में धान की खेती

प्रदेश में खाद्यान की निरन्तर बढ़ती मांग, सिंचाई के साधनों में उत्तरोत्तर वृद्धि तथा रबी की फसल की मड़ाई के लिए आधुनिक यन्त्रों की उपलब्धता से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है कि रबी की फसल के कटने तथा खरीफ की फसल की बुवाई के आरम्भ होने के बीच के समय अर्थात् जायद में भी कुछ खाद्यान उगाये जायें। परिणामस्वरूप चेना, सांवा, मूंग, उर्द एवं मक्का की खेती की सम्भावनायें जायद में पर्याप्त हैं, जायद में धान के प्रयोगों से यह विदित हुआ है कि जायद में धान की खेती निचले एवं जलभराव वाले क्षेत्रों में ही किया जाना उचित होगा।

वैसे तो दक्षिणी भारत के प्रान्तों में रबी एवं जायद में धान की खेती सफलतापूर्वक जी जा रही है लेकिन अपने प्रदेश तथा उत्तरी भारत के अन्य प्रदेशों में तापक्रम बहुत कम (ठंड) के कारण जायद में धान की खेती की कुछ कठिनाइयां हैं। अतः जायद में इसकी खेती के लिए इसकी बुवाई की विधि एवं समय पर विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। उत्तर प्रदेश में जायद की खेती करने की निम्नलिखित विधि हैः

1. उपयुक्त किस्मो का चुनाव

खरीफ में बोई जाने वाली सभी किस्में जायद में नहीं उगायी जा सकती। उत्तर भारत में जायद में धान की खेती के लिए शीघ्र पकने वाली ऐसी किस्में जिनके बेड़ की अवस्था में पौध में ठंड सहने की क्षमता तथा बाली बनते निकलते तथा दाना बनते समय पौधों में कड़ाके की धूप सहने की क्षमता होनी चाहिए। जायद के लिए नरेन्द्र–118, नरेन्द्र–97, साकेत–4, गोविन्द पन्त धान–12, सहभागी, बरानी दीप, शुष्क सम्राट एवं किस्में उपयुक्त पायी गयी हैं।

2. बीज की मात्रा

जायद में अधिक उपज के लिए खरीफ की अपेक्षा कुछ घनी रोपाई अथवा बुवाई करते हैं, क्योंकि गर्मी में पौधों के गिरने की सम्भावना कम होती है। एक हेक्टर की रोपाई के लिए 30–40 किग्रा. तथा सीधी बुवाई के लिए लगभग 60–90 किग्रा. बीज की आवश्यकता पड़ती है।

3. बीज शोधन

नर्सरी डालने से पूर्व बीज शोधन अवश्य कर लें। इसके लिए जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणुधारी रोग की समस्या हो वहां पर 25 किग्रा. बीज के लिए 4 ग्राम स्टेªप्टोसाइक्लीन या 40 ग्राम प्लान्टोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगों दें। दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी डालें। यदि जीवाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों में नहीं है तो 25 किग्रा. बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन निकाल कर अतिरिक्त पानी निकल जाने के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बन्डिाजिम को 8–10 लीटर पानी में घोलकर बीज में मिला दिया जाये इसके बाद छाया में अंकुरित करके नर्सरी में बुवाई की जाय।

4. बुवाई की विधि

जायद में धान की खेती बुवाई की दोनों विधियों अर्थात् सीधी एवं रोपाई द्वारा की जा सकती है।

5. बोने का समय

जायद में धान की खेती के लिए सिंचाई की समुचित व्यवस्था होना आवश्यक है, क्योंकि इस मौसम में फसल को पूरी तरह सिंचाई पर निर्भर रहना पड़ता है। साथ ही साथ तापक्रम की कठिनाई के कारण बुवाई की अवधि भी बहुत ही सीमित हो जाती है। जिसके कारण विशेष सावधानी रखनी पड़ती है। यदि धान की बुवाई, रोपाई विधि से करनी है तो फरवरी के अन्तिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह तक धान की बेहन अवश्य डाल दी जाय, चूंकि अपने यहां इस समय रात में तापक्रम बहुत ही कम रहता है इतने तापक्रम पर बीज का जमाव पूरी तरह नहीं हो पाता है तथा धान के पौधे अच्छी तरह से इस तापक्रम को सहन नहीं कर पाते हैं। अतः उनको क्षति से बचाने के लिए पालीथीन की चादरों या पुआल से ढ़क देना चाहिए जिससे पौधे ठंडक से बच सकें तथा उनकों हवा एवं प्रकाश भी प्राप्त हो सके। 10 बजे दिन से लेकर 3 बजे शाम तक पालीथीन की चादर हटाई जा सकती है, परन्तु 3.30 बजे शाम से पुनः ढ़कना आवश्यक है। यदि बेड़ की बुवाई इस अवधि में पालीथीन की चादरों की कमी अथवा अन्य कारणों से न हो सके तो रोपाई न करके मार्च के प्रथम पखवारे के अन्दर सीधी बुवाई कर देनी चाहिए। 15 मार्च के बाद न तो बेहन डालनी चाहिए न सीधी बुवाई ही करनी चाहिए, क्योंकि इसके बाद बुवाई या रोपार्इ करने से फसल अपना जीवन चक्र जायद में समाप्त नहीं कर पाती, परिणामतः खरीफ की फसल की बुवाई में बाधा पड़ती है।

6. दूरी

यदि खेत अधिक उपजाऊ है तो लाइन से लाइन तथा पौधे से पौधे की दूरी 20×15 सेमी. रखनी चाहिए। यदि खेत औसत उपजाऊ है तो पंक्ति की दूरी 15 से.मी. तथा पौध की दूरी 10 से.मी. रखनी चाहिए।