कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

जायद फसले संभावनाएं

जायद कार्यक्रम के अन्तर्गत कृषि उत्पादन वृद्धि हेतु उपलब्ध संसाधनों का समुचित एवं सामयिक उपयोग परम आवश्यक है। आश्वस्त सिंचन सुविधा सम्पन्न क्षेत्रों में जायद में खेत की उपयुक्तानुसार मूंग, उर्द,चेना,सूरजमुखी,मक्का,धान,हरा चारा, साग-सब्जी तथा हरी खाद की फसले ली जाती है। इससे प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ सिंचाई साधनों का भरपूर उपयोग होता है। जायद कार्यक्रम में लक्ष्य निर्धारण निम्न दो बातो पर निर्भर करता है।

1 आश्वस्त सिंचाई सुविधा।
2 फसल बोने के उपयुक्त समय पर खेत खाली होना।

आश्वस्त सिंचाई सुविधा सामान्य तौर पर निजी नलकूप एवं राजकीय नलकूप पर ही संभव है नहरी क्षेत्रों को जायद फसल हेतु चुनना अधिक उपयुक्त नही होता है। सुनिश्चित सिंचाई साधन वाले क्षेत्रों में आलू गन्ना मटर तथा राई/सरसों के खाली खेतों में जायद की फसले लेना उपयुक्त रहता है। इसके अतिरिक्त बसन्त कालीन गन्ना के खेतों को भी जायद की सह-फसली खेती हेतु चुना जा सकता है।

जायद का मौसम खरीफ फसल हेतु मृदा नमूने एकत्रित कर विश्लेषित कराने का सर्वोत्तम समय है। ऊसर सुधार हेतु भी मिट्टी का विश्लेषण कराना एंव उसी के अनुरूप मृदा सुधारक का प्रयोग तथा ऊसर सुधार के अन्य कार्य भी इस मौसम में नियोजित किए जा सकते है।

अधिकाशं क्षेत्रों में धान– गेहूँ का फसल चक्र अपनाने से भूमि में जीवांश की मात्रा धीरे–धीरे कम होती जा रही है। ऐसे क्षेत्रों में गेहूँ की कटाई के बाद क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर हरी खाद हेतु ढैंचा की बुवाई भी की जा सकती है। जायद की मूंग–उर्द की फलियां तोड़ने के बाद इन फसलों को भी पलट कर रही खाद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

  • जायद में मूँगफली का क्षेत्र बढ़ रहा है अतः जायद में मूंगफली को बढ़ावा दिया जाना उचित होगा।
  • ढैंचे की बुआई कर हरी खाद को बढ़ावा दिया जाना उचित होगा।
  • जायद धान की खेती हो रही है वहां पर देखा जाए कि पानी की उपलब्धता पर्याप्त है।
  • कपास की खेती का जहां क्षेत्र है उसको और बढ़ाये जाने की आवश्यकता है।
  • आगरा⁄ अलीगढ़ मण्डल में बाजार की खेती का प्रचलन बढ़ा है इसको और प्रोत्साहित किया जाना है।
  • आलू की खुदाई के बाद ग्रीष्म कालीन मूँग की बुआई करें।
  • नीम कोटेड यूरिया के प्रयोग से 50-10% नत्रजन की बचत की जा सकती है।