कृषि विभाग,

उत्तर प्रदेश

पारदर्शी किसान सेवा योजना,

किसान का अधिकार किसान के द्वार

गन्ना के रोग

3- काला चिटका(ब्लैक बग) (अप्रैल से जून तक)

यह कीट गन्ने की पेडी पर अधिक सक्रिय रहता है तथा पत्तियाँ का रस चूसता है जिससे फसल दूर से पीली दिखाई देती है।

पहचान

रोकथाम

  • वर्टिसिलियम लैकानी 1.15 प्रतिशत डब्लू0पी0 2.5 किग्रा0 प्रति हे0 की दर से 400-500 ली0 पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर सायंकाल छिड़काव करना चाहिए।

रसायनिक नियंत्रण

रसायनिक नियंत्रण हेतु निम्नलिखित कीटनाषको में से किसी एक का प्रयोग करना चाहिए।

  • क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई0सी01.5 ली0 प्रति हे0 800-1000 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए
  • क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई0सी0 1.5 ली0 प्रति हे0 800-1000 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए ।

1- कडुआ रोग (चाबुक कडुआ) (अप्रैल से मई तक)

रोग ग्रस्त गन्ने की पत्तियाँ पतली, नुकीली तथा पोरिया लम्बी हो जाती है। प्रभावित गन्नों में छोटे या लम्बे काले कोडे निकल आते है जिन पर कवक के असंख्य वीजाणु स्थित होते है। इस रोग का प्रभाव पेडी गन्ने में अत्यधिक होता है।

पहचान

रोकथाम

  • रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • बोने के लिए बीज गन्ने का चयन स्वस्थ एवं रोग रहित खेतों से करना चाहिए ताकि अगली फसल को रोग मुक्त रखा जा सके।
  • रोगी थान का समूल उखाड कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि स्वस्थ गन्नों में दुबारा संक्रमण न हो सके।
  • प्रभावित खेत में कम से कम एक वर्ष तक गन्ना नही बोना चाहिए।
  • समुचित जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। ताकि वर्षा ऋतु में फसल में पानी का जमाव न हो।
  • रोग से प्रभावित खेत में कटाई पश्चात उसमें पत्तियाँ एवं ठूठे को पूरी तरह जलाकर नष्ट कर देना चाहिए तथा खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए।

रसायनिक नियंत्रण

  • बोने से पूर्व गन्ने के 50 कुन्तल बीज सेट को एम0ई0एम0सी0 6 प्रतिशत830 ग्राम प्रति हे0 प्रति की दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए।